दहेज मामले में गिरफ्तारी से बचने के लिए फरार बेटे की बरामदगी की याचिका खारिज, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मां को नहीं दी राहत
Praveen Mishra
22 July 2026 4:35 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उस मां की हैबियस कॉर्पस याचिका खारिज कर दी, जिसने दावा किया था कि उसका 35 वर्षीय बेटा अपनी पत्नी और ससुराल पक्ष द्वारा अवैध रूप से बंधक बनाकर रखा गया है।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि बेटा दहेज उत्पीड़न के मामले में गिरफ्तारी से बचने के लिए फरार है, इसलिए हैबियस कॉर्पस याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।
जस्टिस संदीप जैन की पीठ ने कहा कि दहेज उत्पीड़न मामले की जांच पूरी हो चुकी है और मां तथा बेटे दोनों के खिलाफ आरोपपत्र (Charge Sheet) दाखिल किया जा चुका है।
ऐसे में यह मानने का कोई आधार नहीं है कि बेटे को उसकी पत्नी या ससुराल वालों ने अवैध रूप से हिरासत में रखा है।
क्या था मामला?
याचिकाकर्ता ओमवती ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि उसका बेटा मनीष अपनी पत्नी सोना और उसके परिजनों द्वारा अवैध रूप से बंधक बनाकर रखा गया है। उन्होंने पुलिस पर भी बेटे का पता लगाने में विफल रहने का आरोप लगाया।
हालांकि, राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि मनीष और उसकी पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद चल रहा था। आरोप है कि मनीष और उसके परिजनों ने पत्नी से 2 लाख रुपये अतिरिक्त दहेज की मांग की।
मांग पूरी न होने पर उसके साथ मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना की गई, घर से निकाल दिया गया और उसके साथ छेड़छाड़ भी की गई।
इसके बाद पत्नी ने अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) तथा दहेज निषेध अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज कराई।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी ने मनीष की गिरफ्तारी के लिए गंभीर प्रयास किए, लेकिन वह लगातार फरार रहा और जांच में सहयोग नहीं किया। उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट (NBW) भी जारी करने की प्रक्रिया अपनाई गई और बाद में आरोपपत्र दाखिल कर दिया गया।
कोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति खुद गिरफ्तारी से बचने के लिए फरार हो, तो यह नहीं माना जा सकता कि उसे उसके ससुराल वालों ने अवैध रूप से हिरासत में रखा है।
सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्टों के फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि हैबियस कॉर्पस याचिका तभी स्वीकार की जा सकती है, जब प्रथम दृष्टया किसी व्यक्ति की अवैध हिरासत साबित हो।
फरार आरोपी की ओर से या उसके परिजनों द्वारा ऐसी याचिका दायर करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मां की याचिका खारिज कर दी।


