इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिल्डर पर लगाया ₹25 लाख का जुर्माना, अवैध निर्माण गिराने का आदेश
Praveen Mishra
29 Oct 2026 3:08 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद स्थित गुलमोहर ग्रीन्स हाउसिंग सोसायटी मामले में सख्त रुख अपनाते हुए प्रमोटर पर ₹25 लाख का जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) को याचिका दाखिल करने वाले 11 फ्लैट मालिकों में से प्रत्येक को ₹50,000 मुआवजे के रूप में देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि प्राधिकरण के अधिकारियों ने प्रमोटर के साथ मिलीभगत कर अवैधताओं को जारी रहने दिया, जिसमें कंप्लीशन सर्टिफिकेट के बिना फ्लैटों की बिक्री और उनमें लोगों को रहने की अनुमति देना शामिल है।
जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने GDA द्वारा 18 दिसंबर, 2024 को दी गई तीसरी कंपाउंडिंग मंजूरी को रद्द कर दिया। कोर्ट ने टावर 16, 17, 18 और 19 की नौवीं और दसवीं मंजिलों तथा टावर 27 और 28 को पूरी तरह ध्वस्त करने का भी आदेश दिया।
इसके अलावा, कोर्ट ने प्रमोटर के खिलाफ धोखाधड़ी, गलत बयानी और वैधानिक उल्लंघनों के आरोपों में FIR दर्ज करने का निर्देश दिया। राज्य सरकार को तीसरी कंपाउंडिंग मंजूरी देने वाले GDA उपाध्यक्ष के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने और मामले की जांच में लापरवाही बरतने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ जांच करने का भी आदेश दिया गया।
क्या है पूरा मामला?
गाजियाबाद के साहिबाबाद स्थित 95, कटोरी मिल में गुलमोहर ग्रीन्स हाउसिंग सोसायटी का लेआउट 29 मई, 2006 को 34 टावरों और 904 आवासीय इकाइयों के लिए स्वीकृत किया गया था।
हालांकि, हिंडन एयर फोर्स स्टेशन के अधिकारियों ने कई खसरा भूखंडों पर प्रमोटर के स्वामित्व को लेकर आपत्ति जताई थी। 3 जुलाई, 2010 को लेआउट की मंजूरी रद्द कर दी गई। तब तक 720 आवासीय इकाइयों का निर्माण हो चुका था।
बाद में GDA ने नवंबर 2011, जनवरी 2015 और दिसंबर 2024 में तीन बार कंपाउंडिंग के जरिए निर्माण को नियमित करने की मंजूरी दी। तीसरी मंजूरी में टावर 16, 17, 18 और 19 की नौवीं और दसवीं मंजिलों को नियमित किया गया तथा दो अतिरिक्त टावर बनाने की अनुमति दी गई।
इसके खिलाफ 11 फ्लैट मालिकों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई सोसायटी की रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) द्वारा 2015 में दायर एक अन्य याचिका के साथ की गई।
आठ भूखंडों के स्वामित्व विवाद की अनदेखी पर GDA को फटकार
हाईकोर्ट ने पाया कि हिंडन एयर फोर्स स्टेशन ने कई पत्रों के माध्यम से GDA को सूचित किया था कि आठ भूखंड उसके हैं और इन भूखंडों से संबंधित एक रिट याचिका वर्ष 1990 से लंबित थी।
इसके बावजूद, प्राधिकरण ने स्वामित्व विवाद की उचित जांच किए बिना तीसरी कंपाउंडिंग मंजूरी दे दी। कोर्ट ने कहा कि इतने बड़े आवासीय प्रोजेक्ट को मंजूरी देते समय प्राधिकरण को अधिक सतर्कता बरतनी चाहिए थी।
खंडपीठ ने कहा कि GDA ने विवाद की जानकारी होने के बावजूद संबंधित भूखंडों को कंपाउंडिंग मंजूरी में शामिल किया।
कंप्लीशन सर्टिफिकेट के बिना बेचे गए फ्लैट
कोर्ट ने पाया कि प्रमोटर ने कंप्लीशन सर्टिफिकेट प्राप्त किए बिना ही फ्लैटों का हस्तांतरण किया और खरीदारों को कब्जा दिया।
कोर्ट ने उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 15A और उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट अधिनियम, 2010 की धारा 4(5) का उल्लेख करते हुए कहा कि संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र प्राप्त करना जरूरी था।
प्रमोटर ने दलील दी कि उसने आवश्यक दस्तावेजों के साथ प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया था और इसे अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकृत माना जाना चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को गलत बताया।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि GDA के रिकॉर्ड में 2016 से 2019 के बीच जारी चालान, कारण बताओ नोटिस और रिमाइंडर दर्ज थे। अग्निशमन विभाग समेत अन्य विभागों की अनापत्ति संबंधी औपचारिकताएं भी लंबित थीं, लेकिन इसके बावजूद प्राधिकरण ने प्रभावी कार्रवाई नहीं की।
खंडपीठ ने कहा कि GDA अधिकारियों ने प्रमोटर के साथ मिलीभगत कर अवैध निर्माण को जारी रहने दिया, जिससे सोसायटी में रहने वाले हजारों लोगों की जान खतरे में पड़ सकती थी।
कॉमन एरिया बेचने के मामले में पुलिस जांच पर सवाल
कोर्ट ने सोसायटी के कॉमन एरिया को बेचने के आरोपों से संबंधित 11 अप्रैल, 2018 को दर्ज FIR की जांच पर भी सवाल उठाए। यह मामला IPC की धारा 420, 467, 468 और 471 के तहत दर्ज किया गया था।
कोर्ट के अनुसार, जांच अधिकारी ने साइट का निरीक्षण किए बिना और प्रमोटर का बयान दर्ज किए बिना मामले को दीवानी विवाद मानते हुए फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी।
खंडपीठ ने जांच में लापरवाही पर नाराजगी जताते हुए पुलिस इंस्पेक्टर सुरेंद्र सिंह के निलंबन और उनके खिलाफ विभागीय जांच का निर्देश दिया।
कोर्ट ने गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर को फाइनल रिपोर्ट को मंजूरी देने वाले अधिकारी की पहचान करने और राज्य सरकार को संबंधित अधिकारी के आचरण की जांच करने का भी निर्देश दिया।
इसके अलावा, प्रमोटर के खिलाफ धोखाधड़ी, गलत बयानी और वैधानिक उल्लंघनों के आरोपों में अलग से FIR दर्ज करने तथा जांच अतिरिक्त पुलिस आयुक्त के पद से नीचे के अधिकारी से न कराने का निर्देश दिया गया।
GDA उपाध्यक्ष के खिलाफ अनुशासनात्मक जांच
कोर्ट ने कहा कि प्रमोटर के उल्लंघनों की जानकारी होने के बावजूद तीसरी कंपाउंडिंग मंजूरी देना GDA उपाध्यक्ष की ओर से कर्तव्य में लापरवाही का मामला है।
इसलिए राज्य सरकार को संबंधित उपाध्यक्ष के खिलाफ एक महीने के भीतर अनुशासनात्मक जांच शुरू करने का निर्देश दिया गया।
बिल्डर पर ₹25 लाख का जुर्माना, अवैध निर्माण गिराने के आदेश
कोर्ट ने प्रमोटर को एक महीने के भीतर ₹25 लाख की राशि सोसायटी की रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) के खाते में जमा करने का निर्देश दिया।
GDA को भी 2025 की याचिका दाखिल करने वाले 11 फ्लैट मालिकों में से प्रत्येक को दो महीने के भीतर ₹50,000 देने का आदेश दिया गया। कोर्ट ने कहा कि प्राधिकरण के रवैये के कारण निवासियों को मुकदमेबाजी पर काफी खर्च करना पड़ा।
तीसरी कंपाउंडिंग मंजूरी रद्द करते हुए कोर्ट ने GDA को टावर 16, 17, 18 और 19 की नौवीं तथा दसवीं मंजिलों और टावर 27 व 28 को दो महीने के भीतर ध्वस्त करने का निर्देश दिया। प्राधिकरण को ध्वस्तीकरण का खर्च प्रमोटर से भू-राजस्व के बकाये की तरह वसूलने की अनुमति भी दी गई।
हाईकोर्ट ने दोनों रिट याचिकाओं को स्वीकार कर लिया।

