इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कथित तौर पर नकली लॉ डिग्री के मामले में FIR का सामना कर रहे वकील को अग्रिम ज़मानत दी
Shahadat
22 Sept 2026 8:02 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कथित तौर पर नकली लॉ डिग्री के मामले में FIR का सामना कर रहे वकील को अग्रिम ज़मानत दी। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ इस बात से कि यूनिवर्सिटी से डिग्री 'बिना वेरिफ़ाई हुए' (Unverified) वापस आ गई, शुरुआती स्तर पर यह साबित नहीं होता कि दस्तावेज़ जाली है।
जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की बेंच ने यह आदेश गौरव ब्रजवासी द्वारा दायर अग्रिम ज़मानत अर्ज़ी पर सुनवाई करते हुए दिया। यह अर्ज़ी धोखाधड़ी और जालसाज़ी (BNS के तहत) के अपराधों के लिए दर्ज FIR के सिलसिले में दायर की गई।
यह FIR तब दर्ज की गई थी जब आवेदक की लॉ डिग्री को उसके 'प्रैक्टिस सर्टिफ़िकेट' के नवीनीकरण (Renewal) के दौरान वेरिफ़िकेशन के लिए भेजा गया।
उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के अनुसार, दस्तावेज़ 'बिना वेरिफ़ाई हुए' वापस आ गया, जिसके बाद मोहम्मद कफील बनाम यूपी राज्य और अन्य (2026 LiveLaw (AB) 432) मामले में हाईकोर्ट के निर्देशों के तहत FIR दर्ज की गई।
सुनवाई के दौरान, आवेदक के वकील ने तर्क दिया कि सिर्फ़ इसलिए कि लॉ डिग्री वेरिफ़ाई नहीं हुई, या 'बिना वेरिफ़ाई हुए' वापस आ गई, यह अपने आप में निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दस्तावेज़ जाली है।
कोर्ट को इस तर्क में दम लगा, कम-से-कम शुरुआती स्तर पर।
बेंच ने कहा,
"कोर्ट की शुरुआती राय में आवेदक के वकील का तर्क ठोस लगता है।"
कोर्ट ने गौर किया कि जांच अभी चल रही है। महत्वपूर्ण बात यह है कि संबंधित यूनिवर्सिटी से "कोई निश्चित जवाब नहीं मिला", जिसमें यह कहा गया हो कि आवेदक की डिग्री जाली थी या यह बताया गया हो कि दस्तावेज़ 'बिना वेरिफ़ाई हुए' क्यों वापस किया गया।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि कथित अपराध दस्तावेज़ी सबूतों से संबंधित लगता है और आवेदक से हिरासत में पूछताछ की ज़रूरत नहीं है।
कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि आवेदक का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। उसने यह भी नोट किया कि अपने हलफ़नामे के अनुसार, आवेदक ने दावा किया कि वह सक्रिय रूप से प्रैक्टिस नहीं कर रहा है।
इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने माना कि पुलिस रिपोर्ट जमा होने तक अग्रिम ज़मानत देने का मामला बनता है।
इसके अनुसार, अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी मंज़ूर की गई। आवेदक को निर्देश दिया गया कि वह ज़रूरत पड़ने पर पूछताछ के लिए उपलब्ध रहे, मामले की जानकारी रखने वाले लोगों को प्रभावित या धमकाए नहीं, कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना भारत छोड़कर न जाए और अभियोजन पक्ष के गवाहों पर दबाव न डाले या उन्हें डराए-धमकाए नहीं।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदेश में की गई उसकी टिप्पणियां केवल इस अग्रिम ज़मानत अर्ज़ी पर फ़ैसला करने के लिए थीं और उन्हें मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं माना जाना चाहिए।
Case Title - Gaurang Brijvasi vs. State of U.P. and Another 2026 LiveLaw (AB) 743

