3 महीने अवैध हिरासत में रखने का आरोप: हाईकोर्ट का निर्देश- ₹10 लाख का मुआवज़ा दे यूपी सरकार

Shahadat

7 May 2026 6:57 PM IST

  • 3 महीने अवैध हिरासत में रखने का आरोप: हाईकोर्ट का निर्देश- ₹10 लाख का मुआवज़ा दे यूपी सरकार

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वह एक व्यक्ति को उसकी अवैध गिरफ्तारी और 3 महीने से ज़्यादा समय तक जेल में रखने के लिए ₹10 लाख का मुआवज़ा दे।

    जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की बेंच ने पाया कि राज्य के अधिकारियों ने याचिकाकर्ता को गिरफ्तारी के लिखित कारण न बताकर उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित किया था। कोर्ट ने कहा कि इससे भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत उसके मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है।

    इस संबंध में बेंच ने मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य 2025 LiveLaw (SC) 1066 मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसले पर काफी भरोसा किया। इस फैसले में यह माना गया था कि अगर किसी गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में उसकी समझ में आने वाली भाषा में नहीं बताए जाते हैं तो उसकी गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड अवैध मानी जाएगी।

    नतीजतन, बेंच ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका स्वीकार की और याचिकाकर्ता को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। याचिकाकर्ता को उन 'कारणों' को बताए बिना गिरफ्तार किया गया, जिनके आधार पर उसे गिरफ्तार किया जाना था।

    संक्षेप में मामला

    याचिकाकर्ता (मनोज कुमार) को 27 जनवरी, 2026 को 2024 में दर्ज FIR के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया। जैसा कि पहले बताया गया, गिरफ्तारी मेमो में उसकी गिरफ्तारी के खास कारण नहीं बताए गए; उसमें सिर्फ़ केस क्राइम नंबर का ज़िक्र था।

    इसके बाद संबंधित मजिस्ट्रेट ने भी 28 जनवरी, 2026 को उसे रिमांड पर भेज दिया। इसलिए अपनी गिरफ्तारी, रिमांड आदेश और लगातार हिरासत को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने इस बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट याचिका के साथ हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

    24 अप्रैल को मामले की सुनवाई करते हुए बेंच ने पहली नज़र में यह पाया कि याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी अवैध थी, क्योंकि यह मिहिर राजेश शाह मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बताए गए प्रक्रिया का पालन किए बिना की गई। बेंच ने यह भी दर्ज किया कि मजिस्ट्रेट द्वारा (28 जनवरी को) दिया गया रिमांड आदेश भी रद्द किए जाने योग्य है, यह देखते हुए कि इस अदालत का फैसला शिवम चौरसिया बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य 2026 LiveLaw (AB) 76 मामले में आया था।

    महत्वपूर्ण बात यह है कि 24 अप्रैल की सुनवाई के दौरान, अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार के गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव से जवाब मांगा कि याचिकाकर्ता को जेल में अवैध रूप से कैद रखने के लिए उसे भारी हर्जाना (exemplary costs) क्यों नहीं दिया जाना चाहिए।

    हालांकि, जब 29 अप्रैल को इस मामले पर सुनवाई हुई तो बेंच ने पाया कि अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) ने एक व्यक्तिगत हलफनामा तो दायर किया, लेकिन उसमें अदालत के उस सवाल का कोई जवाब नहीं था जो भारी हर्जाने के मुद्दे पर पूछा गया।

    इसके बजाय, हलफनामे में केवल यह कहा गया कि पुलिस महानिदेशक से एक विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई।

    इस टालमटोल वाले जवाब पर कड़ी आपत्ति जताते हुए बेंच ने निम्नलिखित सख्त टिप्पणी की:

    "...व्यक्तिगत हलफनामे में इस बात की कोई भी जानकारी या स्पष्टीकरण नहीं है कि भारी हर्जाना क्यों नहीं लगाया जाना चाहिए। अगर गृह विभाग के सर्वोच्च अधिकारी, यानी अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) की ओर से सोचने-समझने की इतनी कमी है तो हम अच्छी तरह समझ सकते हैं कि राज्य के अन्य अधिकारी कैसे काम कर रहे होंगे!!!"

    बेंच ने अधिकारियों के प्रति इस बात पर भी नाराजगी जताई कि अदालत के पिछले आदेश के बावजूद आरोपी को रिहा नहीं किया गया; बेंच की राय थी कि गिरफ्तारी अवैध थी।

    बेंच ने टिप्पणी की:

    "...इस अदालत के 24.4.2026 के आदेश के बावजूद, प्रतिवादी अधिकारी अपनी नींद से जागने में विफल रहे हैं और याचिकाकर्ता की अवैध कैद अभी भी जारी है।"

    इसलिए रिट याचिका स्वीकार करते हुए बेंच ने गिरफ्तारी और रिमांड को अवैध घोषित कर दिया और याचिकाकर्ता को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया।

    इसके अलावा, याचिकाकर्ता की अवैध गिरफ्तारी को देखते हुए—जो कि आदेश पारित होने के दिन भी जारी थी—बेंच ने राय दी कि राज्य सरकार पर 10 लाख रुपये का हर्जाना लगाना उचित होगा, जिसे 4 सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को भुगतान किया जाना है।

    अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि राज्य सरकार को यह स्वतंत्रता होगी कि वह कानून के अनुसार उन अधिकारियों से इस राशि की वसूली कर ले, जो इसके लिए जिम्मेदार है।

    Case title - Manoj Kumar Thru. His Son Mudit Kumar vs. State of U.P. Thru. Prin. Secy. Home Deptt. U.P. Lko. and 4 others 2026 LiveLaw (AB) 265

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