'बिजली जीने के लिए आवश्यक ज़रूरत': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक दशक से ज़्यादा समय से कनेक्शन मिलने का इंतज़ार कर रहे व्यक्ति की मदद की

  • बिजली जीने के लिए आवश्यक ज़रूरत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक दशक से ज़्यादा समय से कनेक्शन मिलने का इंतज़ार कर रहे व्यक्ति की मदद की

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को कहा कि आज के समय में बिजली "एक ज़रूरी ज़रूरत" है। कोर्ट ने नॉर्थ ईस्टर्न रेलवे को आदेश दिया कि वह उस व्यक्ति को बिजली कनेक्शन दे, जिसे एक दशक से ज़्यादा समय से बिना बिजली के रहना पड़ रहा है।

    जस्टिस प्रकाश पाडिया और जस्टिस विवेक सरन की बेंच ने कहा कि आर्टिकल 21 के तहत जीने का अधिकार सिर्फ़ किसी व्यक्ति की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बिजली, साफ़-सफ़ाई, सड़कें, साफ़-सुथरा माहौल, पर्याप्त रोशनी और शुद्ध हवा और पानी जैसी ज़रूरी नागरिक सुविधाएं भी शामिल हैं।

    इसके बाद कोर्ट ने उन आदेशों को रद्द किया, जिनके तहत याचिकाकर्ता के नए बिजली कनेक्शन या मौजूदा कनेक्शन को ट्रांसफर करने के अनुरोध को ठुकरा दिया गया।

    यह याचिका फणींद्र दास ने दायर की, जो बलिया में रेलवे कॉलोनी के अंदर स्थित मंदिर के लिए कनेक्शन चाहते हैं। उनके दिवंगत पिता मंदिर के महंत थे और उनके जीवनकाल में रेलवे अधिकारियों ने बिजली कनेक्शन दिया था।

    हालाँकि, उनकी मृत्यु के बाद अपने भाई के साथ विवाद के कारण याचिकाकर्ता को बिजली की सप्लाई नहीं दी गई। याचिकाकर्ता ने या तो नया कनेक्शन लगाने या मौजूदा कनेक्शन को ट्रांसफर करने की माँग की, जो 1978 से उनके दिवंगत पिता और बड़े भाई के नाम पर चल रहा था।

    उन्होंने सब-मीटर के ज़रिए बिजली सप्लाई बहाल करने की भी मांग की।

    रेलवे अधिकारियों ने अनुरोध को ठुकरा दिया, क्योंकि उनका तर्क था कि जिस प्रॉपर्टी पर याचिकाकर्ता बिजली कनेक्शन चाहते हैं, वह रेलवे की प्रॉपर्टी के बीच स्थित है।

    याचिकाकर्ता को प्राइवेट ज़मीन पर बिजली कनेक्शन से जुड़े रेलवे बोर्ड के निर्देश का भी सामना करना पड़ा।

    हाईकोर्ट की टिप्पणियां

    हाईकोर्ट ने उस नज़रिए को खारिज कर दिया, जिसके आधार पर अधिकारियों ने याचिकाकर्ता के अधिकार को ठुकरा दिया।

    बेंच ने कहा:

    "एक संगठित समाज में इंसान के तौर पर जीने का अधिकार पर्याप्त रहने की जगह, सुरक्षित और अच्छे घर, साफ़-सुथरे और अच्छे माहौल, पर्याप्त रोशनी, शुद्ध हवा और पानी, बिजली, साफ़-सफ़ाई और सड़कों जैसी अन्य नागरिक सुविधाओं के बिना संभव नहीं होगा।"

    कोर्ट ने 'चमेली सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला दिया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि रहने की जगह (शेल्टर) के अधिकार का मतलब सिर्फ़ सिर पर छत होना ही नहीं है, बल्कि इसमें वे ज़रूरी सुविधाएं भी शामिल हैं, जो किसी व्यक्ति को एक इंसान के तौर पर जीने और विकास करने में मदद करती हैं।

    सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर बिजली को उन सुविधाओं में शामिल किया, जो रहने की जगह और सम्मान के साथ जीने के अधिकार का हिस्सा हैं।

    बेंच ने 'दिलीप (मृत) बनाम सतीश' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का भी ज़िक्र किया, जो एक किराएदार द्वारा बिजली कनेक्शन की मांग से जुड़ा था। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि "अब यह कानून का एक स्थापित सिद्धांत है कि बिजली एक बुनियादी सुविधा है, जिससे किसी व्यक्ति को वंचित नहीं किया जा सकता"।

    हाईकोर्ट ने 'प्रीति शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले में एक दूसरी बेंच के 2026 के फैसले का भी ज़िक्र किया, जिसमें बिजली पाने के अधिकार को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना गया और अधिकारियों को ज़रूरी औपचारिकताएं पूरी होने पर याचिकाकर्ता की अर्ज़ी पर विचार करने का निर्देश दिया गया।

    इन सिद्धांतों को लागू करते हुए बेंच ने कहा कि यह प्रतिवादियों की "अहम ज़िम्मेदारी" है कि वे यह सुनिश्चित करें कि याचिकाकर्ता को बुनियादी मानवीय ज़रूरतें मिलें। कोर्ट ने कहा कि आज के समय में बिजली "जीने के लिए एक ज़रूरी ज़रूरत" है।

    कोर्ट ने यह भी गौर किया कि प्रतिवादियों ने इस बात पर कोई विवाद नहीं किया कि याचिकाकर्ता उसी जगह रह रहा था, जहां कनेक्शन मांगा गया।

    इसके बावजूद, उसे बिजली नहीं दी गई और नतीजतन उसे पिछले एक दशक से ज़्यादा समय से इसके बिना रहने के लिए 'मजबूर' होना पड़ा।

    बेंच ने कहा कि बिजली कनेक्शन "रेलवे अधिकारियों द्वारा दिया जाना चाहिए, सिवाय उस स्थिति के जहाँ कानून इसकी इजाज़त न देता हो"।

    इसके अनुसार, हाईकोर्ट ने रिट याचिका को मंज़ूरी दी और 26 जुलाई, 2011 और 9 मई, 2012 के उन आदेशों को रद्द किया, जिनके तहत याचिकाकर्ता का अनुरोध ठुकरा दिया गया।

    नॉर्थ ईस्टर्न रेलवे, गोरखपुर के जनरल मैनेजर को निर्देश दिया गया कि वे फ़ैसले की सर्टिफ़ाइड कॉपी पेश किए जाने की तारीख से 30 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता को बिजली कनेक्शन दें, बशर्ते कोई कानूनी अड़चन न हो।

    Case Title - Fanindra Das vs. The General Manager and another 2026 LiveLaw (AB) 761

    अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story