अनुकंपा नियुक्ति में पद से ज्यादा दावेदार हों तो लिखित परीक्षा उचित: इलाहाबाद हाईकोर्ट

  • अनुकंपा नियुक्ति में पद से ज्यादा दावेदार हों तो लिखित परीक्षा उचित: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि अनुकंपा नियुक्ति के लिए उपलब्ध पदों की तुलना में आश्रित अभ्यर्थियों की संख्या अधिक हो, तो उनके बीच चयन के लिए ऑब्जेक्टिव टाइप टेस्ट कराना अनुचित नहीं है।

    जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्य वीर सिंह की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सब-इंस्पेक्टर एवं इंस्पेक्टर (सिविल पुलिस) सर्विस रूल्स, 2015 के नियम 5(1) में शामिल उस नोट को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दीं, जिसके तहत अनुकंपा नियुक्तियां प्रत्येक वर्ष सीधी भर्ती से भरे जाने वाले पदों के अधिकतम 5 प्रतिशत तक सीमित हैं।

    कोर्ट ने कहा कि जब उपलब्ध पदों से अधिक अभ्यर्थी अनुकंपा नियुक्ति के लिए दावेदार हों, तो किसे अधिक जरूरतमंद माना जाए, इसे लेकर विवाद की संभावना रहती है। ऐसे में ऑब्जेक्टिव टेस्ट एक निष्पक्ष चयन का तरीका हो सकता है।

    खंडपीठ ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति में भी प्रतिस्पर्धा के तत्व को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता, जब दावेदारों की संख्या उपलब्ध रिक्तियों से अधिक हो।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट अशोक खरे ने दलील दी कि अनुकंपा नियुक्ति उत्तर प्रदेश मृतक आश्रित नियमावली, 1974 के तहत होती है, जिसमें ऐसी नियुक्तियों पर 5 प्रतिशत की सीमा नहीं है। उन्होंने Ashish Bahadur Singh v. State of U.P. और State of U.P. v. Himanshu Yadav के फैसलों का भी हवाला दिया।

    याचिकाओं में 18 सितंबर 2015 के शासनादेश को भी चुनौती दी गई थी। इसके तहत यदि आश्रित अभ्यर्थियों की संख्या उपलब्ध पदों से अधिक हो, तो उन्हें ऑब्जेक्टिव टेस्ट में शामिल होना होता है और संबंधित पद के लिए केवल एक अवसर दिया जाता है।

    दलील दी गई कि लिखित परीक्षा अनुकंपा नियुक्ति के उद्देश्य को ही खत्म कर देती है।

    वहीं, राज्य सरकार ने Ankur Gautam v. State of U.P. फैसले का हवाला देते हुए कहा कि हाईकोर्ट पहले ही इस व्यवस्था को उचित और वैध ठहरा चुका है। कोर्ट ने भी माना कि उक्त फैसले में नियम की वैधता स्पष्ट रूप से बरकरार रखी गई थी।

    खंडपीठ ने कहा कि Himanshu Yadav में Ankur Gautam के फैसले पर विचार किए जाने का कोई प्रमाण नहीं है। वहीं, Ashish Bahadur Singh मामले में विशेष अपील भी खारिज हो चुकी है और उस मामले में दिया गया निर्देश अलग संदर्भ में था।

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने सभी याचिकाएं खारिज कर दीं।

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    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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