मृतक मां की जगह मिली अनुकंपा नियुक्ति 12 साल बाद नहीं छीनी जा सकती, जब विभाग को पिता की सरकारी नौकरी की जानकारी थी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Praveen Mishra

22 July 2026 3:44 PM IST

  • मृतक मां की जगह मिली अनुकंपा नियुक्ति 12 साल बाद नहीं छीनी जा सकती, जब विभाग को पिता की सरकारी नौकरी की जानकारी थी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) देते समय विभाग को आवेदक के पिता की सरकारी नौकरी की जानकारी थी और दस्तावेजों के सत्यापन के बाद नियुक्ति दी गई थी, तो लगभग 12 वर्ष बाद यह कहते हुए सेवा समाप्त नहीं की जा सकती कि आवेदक ने तथ्य छिपाए थे।

    जस्टिस प्रकाश पाड़िया की पीठ ने कहा कि बिना विभागीय जांच, आरोपपत्र (Charge-sheet) और साक्ष्यों की जांच के कर्मचारी को सेवा से हटाना पूरी तरह अवैध है।

    क्या था मामला?

    याचिकाकर्ता की मां आजमगढ़ के कंजय जूनियर हाई स्कूल में सहायक अध्यापिका थीं। उनका 5 नवंबर 2008 को निधन हो गया। उस समय याचिकाकर्ता नाबालिग था। उसके पिता लोक निर्माण विभाग (PWD) में अकाउंटेंट थे और 28 फरवरी 2009 को सेवानिवृत्त हुए।

    बालिग होने के बाद याचिकाकर्ता ने वर्ष 2011 में अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। दस्तावेजों के सत्यापन के बाद ब्लॉक शिक्षा अधिकारी ने नियुक्ति की संस्तुति की, जिसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि याचिकाकर्ता के पिता सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके हैं।

    इसके बाद वर्ष 2013 में उसे जूनियर क्लर्क नियुक्त किया गया और 2019 में पदोन्नत कर सीनियर क्लर्क बना दिया गया।

    12 साल बाद सेवा समाप्त

    वर्ष 2022 में एक शिकायत के आधार पर आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता ने अपने पिता की सरकारी नौकरी की जानकारी छिपाकर अनुकंपा नियुक्ति हासिल की।

    कई कारण बताओ नोटिसों के बाद 11 अगस्त 2025 को जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने उसकी सेवा समाप्त कर दी।

    हाईकोर्ट ने क्या कहा?

    हाईकोर्ट ने पाया कि नियुक्ति की संस्तुति में ही यह दर्ज था कि याचिकाकर्ता के पिता सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। यानी विभाग को शुरू से ही इस तथ्य की पूरी जानकारी थी। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता ने कोई तथ्य छिपाया था।

    अदालत ने यह भी कहा कि 12 वर्षों तक बिना किसी शिकायत के सेवा लेने के बाद विभाग अपनी ही लापरवाही का लाभ उठाकर नियुक्ति रद्द नहीं कर सकता, खासकर तब जब कर्मचारी ने कोई धोखाधड़ी, जालसाजी या तथ्य छिपाने का काम नहीं किया हो।

    कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि नियुक्ति विभाग की जानकारी और सत्यापन के बाद हुई है, तो बाद में विभाग अपनी गलती का दोष कर्मचारी पर नहीं डाल सकता।

    सेवा बहाल करने का आदेश

    हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की बर्खास्तगी को पूरी तरह अवैध करार देते हुए आदेश रद्द कर दिया।

    अदालत ने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी और ब्लॉक शिक्षा अधिकारी, आजमगढ़ को याचिकाकर्ता को सीनियर क्लर्क के पद पर बहाल करने तथा बकाया वेतन (Back Wages) और अन्य सभी सेवा लाभ देने का निर्देश दिया।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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