संज्ञान लेने से पहले कोर्ट गवाह से पूछताछ कर नया साक्ष्य नहीं जुटा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

  • संज्ञान लेने से पहले कोर्ट गवाह से पूछताछ कर नया साक्ष्य नहीं जुटा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि संज्ञान (Cognizance) लेने से पहले ट्रायल कोर्ट किसी गवाह से पूछताछ कर नया साक्ष्य (Evidence) नहीं जुटा सकती, क्योंकि ऐसी शक्ति CrPC की धारा 190 के तहत उपलब्ध नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर अदालत का काम केवल जांच एजेंसी द्वारा प्रस्तुत रिकॉर्ड पर न्यायिक विचार करना है, न कि अतिरिक्त साक्ष्य एकत्र करना।

    जस्टिस संतोष राय ने यह टिप्पणी सहारनपुर की एक ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए की। ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान लेने से पहले मेडिकल ऑफिसर को अदालत में बुलाकर उसका बयान दर्ज किया था और उसी के आधार पर मामले में IPC की धारा 307 (हत्या के प्रयास) जोड़ दी थी। साथ ही डॉक्टर की कथित त्रुटिपूर्ण मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई के भी निर्देश दिए थे।

    हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा अपनाई गई यह प्रक्रिया CrPC के प्रावधानों के पूरी तरह विपरीत है। अदालत ने कहा कि यदि मेडिकल रिपोर्ट में किसी प्रकार का सुधार आवश्यक था तो जांच अधिकारी धारा 173(8) CrPC के तहत पूरक जांच करवा सकता था या डॉक्टर ट्रायल के दौरान गवाही देते समय स्पष्टीकरण दे सकता था। संज्ञान से पहले अदालत स्वयं गवाह का बयान दर्ज कर नए साक्ष्य नहीं बना सकती।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि आपराधिक अदालत किसी गवाह के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के निर्देश देने वाली अनुशासनात्मक प्राधिकारी (Disciplinary Authority) नहीं है। बिना सुनवाई का अवसर दिए किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई का आदेश देना अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने 4 जून 2025 का संज्ञान आदेश रद्द कर दिया और मामले को ट्रायल कोर्ट के पास वापस भेजते हुए निर्देश दिया कि वह केवल चार्जशीट, केस डायरी और जांच अधिकारी द्वारा विधिसम्मत रूप से एकत्र किए गए रिकॉर्ड के आधार पर कानून के अनुसार नया आदेश पारित करे। साथ ही डॉक्टर के खिलाफ शुरू की गई विभागीय जांच भी समाप्त करने का निर्देश दिया।

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

    Next Story