कस्टडी विवाद के बीच बच्चे को जबरन बोर्डिंग स्कूल नहीं भेजा जा सकता, मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Praveen Mishra

23 Jan 2026 4:13 PM IST

  • कस्टडी विवाद के बीच बच्चे को जबरन बोर्डिंग स्कूल नहीं भेजा जा सकता, मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि माता-पिता के बीच चल रहे कस्टडी विवाद के दौरान किसी बच्चे को बोर्डिंग स्कूल भेजने का निर्देश देने से पहले उस बच्चे का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन (Psychological Evaluation) किया जाना आवश्यक है, ताकि यह आकलन किया जा सके कि वह उस अभिभावक से अलग रहने के मानसिक और भावनात्मक प्रभाव को सहन कर पाएगा या नहीं, जिसके साथ वह अब तक रह रहा है।

    चीफ़ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने नाबालिग बेटे की कस्टडी और विज़िटेशन को लेकर चल रहे विवाद में यह टिप्पणी की।

    खंडपीठ ने कहा,

    “अदालत को यह सुनिश्चित करना होता है कि पति-पत्नी के बीच चल रही कानूनी लड़ाई में बच्चे को न तो हथियार बनाया जाए और न ही उसका शोषण हो। किसी बच्चे को बोर्डिंग स्कूल भेजना कोई काले-सफेद में लिया जाने वाला निर्णय नहीं हो सकता। यह आवश्यक है कि बच्चे का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाए, ताकि यह पता चल सके कि क्या उसे उसकी माँ की कस्टडी से हटाकर बोर्डिंग स्कूल भेजना उचित होगा। बच्चा इस स्थिति पर कैसे प्रतिक्रिया देगा, यह निर्णय लेने से पहले एक महत्वपूर्ण पहलू है।”

    मामले के अनुसार, माता-पिता का विवाह वर्ष 2017 में हुआ था और 2018 में उनका पुत्र पैदा हुआ। वैवाहिक संबंधों में कड़वाहट आने के बाद दोनों अलग हो गए और एक-दूसरे के खिलाफ कई कानूनी कार्यवाहियाँ शुरू कीं। माँ झारखंड के धनबाद से अपने बेटे के साथ लखनऊ आ गई।

    माँ का आरोप था कि लखनऊ में बेटे को घुमाने के बहाने पिता उसे उसकी कस्टडी से बाहर ले जाकर धनबाद ले गया। इसके बाद माँ ने पिता के खिलाफ FIR दर्ज कराई और बेटे की कस्टडी पाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की।

    एकल न्यायाधीश ने बच्चे की कस्टडी माँ को सौंपते हुए पिता को विज़िटेशन अधिकार दिए। बाद में पिता ने आरोप लगाया कि माँ विज़िटेशन में बाधा डाल रही है और दूसरी हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की, जिसे इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि पहले मामले में आवेदन लंबित था और दूसरी याचिका विचारणीय नहीं थी।

    इसके बाद पिता द्वारा अवमानना याचिका भी दायर की गई, जिसमें माँ ने आदेश का पालन करने का आश्वासन दिया। हालांकि, चूँकि दोनों पक्षों ने विशेष अपीलें दायर कर रखी थीं, इसलिए अवमानना याचिका भी खारिज कर दी गई।

    इस बीच, दोनों माता-पिता द्वारा कई आवेदन दायर किए गए और पिता के विज़िटेशन अधिकारों में संशोधन किया गया, जिसे दोनों पक्षों ने अंतर-न्यायालय अपीलों में चुनौती दी।

    अदालत ने बच्चे के हित में माता-पिता के बीच सुलह कराने का भी प्रयास किया, लेकिन वह सफल नहीं हो सका। अंततः कोर्ट ने अंतरिम रूप से निर्देश दिया कि दोनों माता-पिता बच्चे से एक साथ मिलें और बच्चे की उपस्थिति में शालीन व्यवहार बनाए रखें।

    खंडपीठ ने कहा कि माता-पिता द्वारा लगाए गए आरोप-प्रत्यारोप तथ्यात्मक हैं और साक्ष्य के बाद ही उनका मूल्यांकन किया जा सकता है, लेकिन अदालत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वैवाहिक संघर्ष के बीच बच्चे के सर्वोत्तम हितों की रक्षा कैसे की जाए।

    अदालत ने कहा कि मुख्य प्रश्न यह है कि बच्चे की कस्टडी पिता को दी जाए या उसे बोर्डिंग स्कूल भेजा जाए।

    यह देखते हुए कि बच्चा अपने जीवन का अधिकांश समय माँ के साथ रहा है और लखनऊ के एक प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ते हुए शैक्षणिक रूप से अच्छा कर रहा है, कोर्ट ने कहा कि यदि माता-पिता साथ रहते हुए लगातार झगड़ रहे होते, तो बोर्डिंग स्कूल का विकल्प विचारणीय हो सकता था। लेकिन वर्तमान मामले में बच्चा माँ के साथ रहते हुए किसी प्रकार के मानसिक तनाव के संकेत नहीं दिखा रहा है।

    खंडपीठ ने कहा,

    “बच्चा वर्तमान में लगभग 7 वर्ष का है और रिकॉर्ड पर ऐसी कोई परिस्थिति नहीं है जिससे यह संकेत मिले कि वह माँ के साथ किसी विषाक्त माहौल में रह रहा है। ऐसी स्थिति में बच्चे को उसकी माँ से अलग कर पिता को सौंपना या बोर्डिंग स्कूल भेजना उचित नहीं होगा, खासकर जब वह अपने परिवेश, स्कूल, दोस्तों और जीवनशैली के साथ सहज है।”

    यह भी ध्यान में रखते हुए कि पिता द्वारा गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 के तहत दायर याचिका ट्रायल कोर्ट में लंबित है, हाईकोर्ट ने बच्चे की कस्टडी माँ से पिता को स्थानांतरित करने से इनकार कर दिया।

    बोर्डिंग स्कूल भेजने के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई विशेषज्ञ मत या रिपोर्ट नहीं है जिससे यह सिद्ध हो कि बच्चा माँ से शारीरिक रूप से दूर रहकर भावनात्मक दबाव झेल सकता है। अतः यह प्रश्न भविष्य में फैमिली कोर्ट द्वारा विशेषज्ञ रिपोर्टों के आधार पर तय किया जा सकता है।

    अदालत ने कहा कि पहले पारित किया गया विज़िटेशन आदेश पर्याप्त और विस्तृत है और उम्मीद जताई कि दोनों माता-पिता बच्चे के हित को सर्वोपरि रखते हुए न्यायालय के आदेशों का पालन करेंगे।

    Next Story