प्रधान से पंचायत फंड के नुकसान की वसूली के लिए समय-सीमा में मौजूद विरोधाभास को ठीक करे राज्य सरकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
5 Aug 2026 6:47 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ग्राम पंचायत के पैसे या संपत्ति के नुकसान, बर्बादी या गलत इस्तेमाल के लिए ग्राम प्रधान पर सरचार्ज (अतिरिक्त शुल्क) लगाने की समय-सीमा यूपी पंचायत राज एक्ट, 1947 की धारा 27 के प्रावधान से तय होती है, न कि यूपी पंचायत राज नियम 1947 के नियम 257(2) के तीसरे प्रावधान में बताई गई कम समय-सीमा से। कोर्ट ने माना कि यह नियम एक्ट के प्रावधानों के खिलाफ है।
यूपी पंचायत राज एक्ट, 1947 की धारा 27 के प्रावधान के तहत सरचार्ज की जिम्मेदारी नुकसान, बर्बादी या गलत इस्तेमाल होने के दस साल बाद, या जिम्मेदार व्यक्ति के पद छोड़ने की तारीख से पांच साल बाद (जो भी बाद में हो) खत्म हो जाती है।
यूपी पंचायत राज नियम 1947 के नियम 257(2) का तीसरा प्रावधान कम समय-सीमा तय करता है। इसके तहत कोई भी प्रधान, उप-प्रधान, सदस्य, अधिकारी या कर्मचारी घटना के चार साल बाद या पद छोड़ने की तारीख के तीन साल बाद (जो भी बाद में हो) किसी भी नुकसान, बर्बादी या गलत इस्तेमाल के लिए जिम्मेदार नहीं होता है।
जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच ने कहा,
"कानून यह है कि कोई नियम उस एक्ट की जगह नहीं ले सकता, उसे रद्द नहीं कर सकता या उसके खिलाफ नहीं हो सकता, जिसके तहत उसे बनाया गया। साफ तौर पर यूपी पंचायत राज नियम 1947 के नियम 257 का तीसरा प्रावधान धारा 27 के प्रावधान के खिलाफ है, जो इस मामले से जुड़ा मुख्य प्रावधान है।"
अपीलकर्ता एक ग्राम प्रधान हैं। उसने अपनी रिट याचिका पर 17 जून 2026 को पारित अंतरिम आदेश के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट नियम 1952 के चैप्टर VIII नियम 5 के तहत विशेष अपील दायर की। उस आदेश के तहत सरचार्ज आदेश के तहत 4,38,104 रुपये की वसूली पर अगली सुनवाई की तारीख तक रोक लगा दी गई, लेकिन उन्हें 15 दिनों के भीतर 2 लाख रुपये जमा करने का निर्देश दिया गया। अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने मार्च 2026 में अपना पद छोड़ दिया और यूपी पंचायत राज नियम 1947 के नियम 256 और नियम 257 के अनुसार, पद छोड़ने के तीन साल बाद सरचार्ज नहीं लगाया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि सरचार्ज का प्रावधान यूपी पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 27 में किया गया, जो इस विषय पर मुख्य प्रावधान है। इसके प्रोविज़ो (शर्त) में नियमों की तुलना में लंबी अवधि तय की गई। कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता जिस फैसले का हवाला दे रहा था, उसमें वह मुद्दा शामिल नहीं था जो अभी कोर्ट के सामने था। यह भी देखा कि विवादित आदेश पारित करते समय सिंगल जज ने धारा 27 के प्रोविज़ो पर ध्यान नहीं दिया।
चूंकि नियम अधिनियम के मुख्य प्रावधान के विपरीत नहीं हो सकते, इसलिए कोर्ट ने एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल को निर्देश दिया कि वह इस फैसले की जानकारी A.C.S./प्रधान सचिव, पंचायत राज को दें और कहा,
“राज्य सरकार को इस मामले पर विचार करना चाहिए और इस विसंगति को दूर करना चाहिए क्योंकि इससे अनावश्यक मुकदमेबाजी हो सकती है।”
इसके अनुसार, अपीलकर्ता की दलील में कोई दम न पाते हुए कोर्ट ने अपील खारिज की।
Case Title: Harikesh Verma v. State Of U.P. Thru. Prin. Secy. Panchayati Raj Deptt. Lko. And 5 Others


