पत्नी की सुविधा या बच्चे का हित ही केस के ट्रांसफर का आधार नहीं, न्याय प्रभावित होने का खतरा दिखाना होगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Praveen Mishra

4 Aug 2026 3:53 PM IST

  • पत्नी की सुविधा या बच्चे का हित ही केस के ट्रांसफर का आधार नहीं, न्याय प्रभावित होने का खतरा दिखाना होगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि वैवाहिक मामलों में पत्नी की सुविधा और नाबालिग बच्चे का हित महत्वपूर्ण कारक हैं, लेकिन केवल इन्हीं आधारों पर किसी मामले को एक अदालत से दूसरी अदालत स्थानांतरित (Transfer) नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि असली कसौटी यह है कि यदि मामला स्थानांतरित नहीं किया गया तो क्या न्याय मिलने में बाधा या विफलता होगी।

    जस्टिस योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने यह टिप्पणी उस याचिका पर की, जिसमें पत्नी ने पति द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत दायर दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना (Restitution of Conjugal Rights) की याचिका को अलीगढ़ फैमिली कोर्ट से गौतम बुद्ध नगर फैमिली कोर्ट स्थानांतरित करने की मांग की थी।

    पत्नी का कहना था कि वह अपनी नाबालिग बेटी के साथ गौतम बुद्ध नगर में रहती है। बार-बार अलीगढ़ आने-जाने से आर्थिक बोझ बढ़ेगा और बेटी की पढ़ाई भी प्रभावित होगी। उसने यह भी तर्क दिया कि उसके भरण-पोषण (Maintenance) का मामला पहले से गौतम बुद्ध नगर की फैमिली कोर्ट में लंबित है, इसलिए दोनों मामलों की सुनवाई एक ही अदालत में होनी चाहिए।

    हालांकि, पति ने इसका विरोध करते हुए कहा कि पत्नी का मायका और ननिहाल दोनों अलीगढ़ में हैं और ट्रांसफर की मांग केवल मुकदमे में देरी करने के उद्देश्य से की गई है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि सीपीसी की धारा 24 के तहत मामला स्थानांतरित करने की शक्ति न्याय के हित में प्रयोग की जाती है, न कि किसी पक्ष की व्यक्तिगत सुविधा के लिए। केवल अतिरिक्त यात्रा या असुविधा ट्रांसफर का पर्याप्त आधार नहीं हो सकती, जब तक यह न दिखाया जाए कि इससे न्याय प्रभावित होगा।

    अदालत ने यह भी कहा कि भरण-पोषण और दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना की कार्यवाही अलग-अलग प्रकृति और उद्देश्य की होती है। केवल दोनों मामलों का अलग-अलग अदालतों में लंबित होना उन्हें एक ही अदालत में स्थानांतरित करने का आधार नहीं बनता।

    इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने ट्रांसफर याचिका खारिज कर दी और अलीगढ़ फैमिली कोर्ट को मामले का शीघ्र निस्तारण करने का निर्देश दिया।

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    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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