कृषि भूमि की सीमा का विवाद Advocate Commissioner के नक्शे से तय नहीं कर सकता सिविल कोर्ट: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Praveen Mishra
7 Sept 2026 1:17 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि जब किसी मुकदमे में असली विवाद दो सटी हुई कृषि जमीनों की सीमा (Boundary) तय करने का हो, तो सिविल कोर्ट केवल Advocate Commissioner की रिपोर्ट या नक्शे के आधार पर उस सीमा का निर्धारण नहीं कर सकता।
जस्टिस अनिल कुमार-X ने कहा कि U.P. Revenue Code, 2006 की धारा 24 में कृषि भूमि की सर्वे और सीमांकन (Survey & Demarcation) के लिए विशेष कानूनी व्यवस्था है। इसलिए ऐसी सीमा का निर्धारण सक्षम राजस्व प्राधिकरण (Revenue Authority) द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत होना चाहिए।
क्या था मामला?
यह मामला हाथरस के मौजा शेरपुर का है। वर्ष 2001 में वादियों ने लगभग 0.60 एकड़ जमीन, खसरा संख्या 815, पर स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) के लिए मुकदमा दायर किया था।
वादियों का आरोप था कि दक्षिण दिशा में स्थित खसरा संख्या 816 के दर्ज खातेदार उनकी जमीन के एक हिस्से पर निर्माण करने की कोशिश कर रहे हैं।
वहीं, प्रतिवादियों ने दावा किया कि वादियों ने खसरा संख्या 815 की दक्षिणी सीमा गलत तरीके से तय की है और उसमें खसरा संख्या 816 और 817 की कुछ जमीन भी शामिल कर ली है।
निचली अदालतों का फैसला
ट्रायल कोर्ट ने 2023 में वादियों के पक्ष में फैसला दिया। कोर्ट ने प्लेंट मैप, राजस्व नक्शे और अमीन की रिपोर्ट के आधार पर जमीन की सीमा और उसका माप तय किया।
First Appellate Court ने भी इस फैसले को बरकरार रखा।
इसके बाद प्रतिवादियों ने हाईकोर्ट में Second Appeal दाखिल की। उनका तर्क था कि असल विवाद कृषि भूमि के सीमांकन (Demarcation) का है, जिसका फैसला Revenue Authority को करना चाहिए।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल किसी मामले को निषेधाज्ञा (Injunction) का मुकदमा बताकर सिविल कोर्ट को कृषि भूमि की सीमा तय करने का अधिकार नहीं मिल जाता।
कोर्ट ने कहा कि जब गाटा संख्या पर विवाद नहीं है, लेकिन उस गाटा में आने वाली वास्तविक जमीन की सीमा या क्षेत्रफल विवादित है, तो यह मूल रूप से सीमांकन (Demarcation) का मामला है।
ऐसे विवाद का फैसला U.P. Revenue Code में निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही होना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि Advocate Commissioner की रिपोर्ट को साक्ष्य (Evidence) के तौर पर देखा जा सकता है, लेकिन वह Revenue Authority द्वारा किए जाने वाले वैधानिक सर्वे और सीमांकन (Statutory Survey & Demarcation) का विकल्प नहीं हो सकती।
दोनों निचली अदालतों के फैसले रद्द
हाईकोर्ट ने माना कि निचली अदालतों ने जमीन की लंबाई-चौड़ाई और सीमाएं तय करके वास्तव में खसरा संख्या 815 और उससे लगी खसरा संख्या 816 की सीमा निर्धारित कर दी थी। यह केवल निषेधाज्ञा देने तक सीमित नहीं था, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से सीमांकन (Demarcation) करने के बराबर था।
इसलिए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और First Appellate Court दोनों के फैसले रद्द कर दिए।
हालांकि, कोर्ट ने वादियों को U.P. Revenue Code के तहत उचित कानूनी उपाय (Remedy) अपनाने की स्वतंत्रता दी और अपील स्वीकार कर ली।


