इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1979 में पत्नी की हत्या के आरोप में उम्रकैद की सज़ा पाए पति को बरी किया; 4 साल की देरी का हवाला दिया

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1979 में पत्नी की हत्या के आरोप में उम्रकैद की सज़ा पाए पति को बरी किया; 4 साल की देरी का हवाला दिया

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुरुवार को एक ऐसे व्यक्ति को बरी किया, जिसे 1979 में अपनी पत्नी की कथित हत्या के लिए उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई। कोर्ट ने पाया कि FIR दर्ज करने में 4 साल से ज़्यादा की बिना वजह देरी हुई और मौत की वजह को लेकर मेडिकल सबूत भी विरोधाभासी थे।

    यह देखते हुए कि अभियोजन पक्ष आरोपी त्रिवेणी का दोष बिना किसी उचित संदेह के साबित नहीं कर पाया, जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की बेंच ने उसकी सज़ा को रद्द कर दिया और उसे संदेह का लाभ दिया।

    अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, मृतक महिला की शादी 1978 में आरोपी-अपीलकर्ता (त्रिवेणी) से हुई। आरोप था कि उसका पति और ससुराल वाले दहेज से नाखुश थे और मोटरसाइकिल की मांग कर रहे थे।

    मांग पूरी न होने के कारण 30 जून 1979 को अपनी मौत से पहले उसे कथित तौर पर क्रूरता और उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा। हालाँकि घटना 1979 में हुई, लेकिन FIR नवंबर 1983 में दर्ज की गई।

    मई 1987 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी-अपीलकर्ताओं [छोटे लाल, त्रिवेणी और शांति] को दोषी पाया और IPC की धारा 302 के साथ धारा 34 के तहत उन्हें उम्रकैद की सज़ा सुनाई।

    अपनी सज़ा को चुनौती देते हुए वह हाईकोर्ट गए और तर्क दिया कि FIR लगभग चार साल और छह महीने की बिना वजह देरी के बाद दर्ज की गई, और अपीलकर्ताओं के खिलाफ ठोस सबूत नहीं है।

    यह भी तर्क दिया गया कि यह साबित नहीं किया जा सका कि पूरी संभावना के साथ अपराध अपीलकर्ताओं ने ही किया।

    आगे यह भी कहा गया कि घटना के समय अपीलकर्ता-पति त्रिवेणी घर पर मौजूद नहीं था और यह असल में दुर्घटनावश हुई मौत का मामला है और मेडिकल सबूत अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन नहीं करते हैं।

    अपील लंबित रहने के दौरान, पति के माता-पिता की मृत्यु हो गई। इसलिए उनके मामले में अपील समाप्त हो गई। कोर्ट ने केवल पति की अपील पर विचार किया। रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री की जांच करते हुए बेंच ने सबसे पहले FIR दर्ज करने में हुई "बहुत ज़्यादा देरी" के मुद्दे पर बात की।

    कोर्ट ने कहा कि हालांकि FIR दर्ज करने में देरी हमेशा केस को खत्म नहीं करती अगर उसका संतोषजनक कारण बताया जाए, लेकिन असामान्य और बिना कारण वाली देरी अभियोजन पक्ष के मामले पर गंभीर संदेह पैदा करती है।

    कोर्ट ने गौर किया कि देरी से अक्सर कहानी में बढ़ा-चढ़ाकर बातें जोड़ी जाती हैं और घटना का गलत, बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया या मनगढ़ंत संस्करण सामने आने का खतरा रहता है, इसलिए अदालतों को सबूतों का मूल्यांकन अधिक सावधानी से करना पड़ता है।

    चार साल से ज़्यादा की देरी के लिए कोई संतोषजनक कारण न बताए जाने पर बेंच ने कहा:

    "इस मामले में लगभग चार साल और छह महीने की देरी अभियोजन पक्ष के मामले की विश्वसनीयता को शुरुआत से ही बुरी तरह कमजोर कर देती है। अभियोजन पक्ष ने इतनी लंबी देरी के लिए कोई संतोषजनक कारण नहीं बताया है।"

    हाईकोर्ट ने मेडिकल सबूतों पर भी विचार किया और पाया कि अभियोजन पक्ष इस बुनियादी तथ्य को साबित करने में विफल रहा कि मृतक की मौत हत्या (Homicidal) थी।

    राज्य के मेडिको-लीगल एक्सपर्ट की राय थी कि जलने के निशान संभवतः ज्वलनशील पदार्थ डालने के कारण बने थे। हालांकि, पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने शरीर पर बड़े पैमाने पर बिजली से जलने के निशान दर्ज किए और बिजली से जलने के एंट्री और एग्जिट निशान पाए।

    'पारिख की टेक्स्टबुक ऑफ़ मेडिकल ज्यूरिस्प्रूडेंस, फोरेंसिक मेडिसिन एंड टॉक्सिकोलॉजी' का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि ऐसे निशान बिजली का झटका लगने (Electrocution) का संकेत देते हैं, न कि ज्वलनशील पदार्थ से जलने का।

    कोर्ट ने पाया कि किसी भी मेडिकल राय से मौत की वजह पक्के तौर पर साबित नहीं हुई और कहा:

    "यह एक स्थापित कानूनी सिद्धांत है कि जब मुख्य सवाल यह हो कि मौत हत्या थी, दुर्घटना थी या आत्महत्या, और इस पर शक बना रहे तो अभियोजन पक्ष का मामला निश्चित रूप से विफल हो जाता है। आरोपी को सिर्फ़ हत्या के अनुमान के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अगर सबूतों से आत्महत्या या दुर्घटना से मौत की संभावना भी बनती है तो शक का लाभ निश्चित रूप से आरोपी को मिलता है"।

    राज्य के इस तर्क को खारिज करते हुए कि घटना के दिन रात 1:45 बजे के बाद बिजली की आपूर्ति नहीं थी, बेंच ने कहा कि घटना 29-30 जून, 1979 की रात को हुई, और यह "पूरी तरह संभव" है कि यह बिजली जाने से पहले हुई हो।

    बेंच ने यह भी पाया कि अभियोजन पक्ष घटना स्थल पर अपीलकर्ता की मौजूदगी को बिना किसी शक के साबित करने में विफल रहा। उसने गौर किया कि भले ही उसकी मौजूदगी मान ली जाए, अभियोजन पक्ष के किसी भी गवाह ने उसे कोई खास भूमिका नहीं सौंपी थी।

    कोर्ट ने जोर दिया कि परिस्थितिजन्य सबूतों पर आधारित मामलों में केवल शक के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने पाया कि परिस्थितियों की कड़ी केवल अपीलकर्ता के दोषी होने की परिकल्पना के अनुरूप नहीं थी।

    FIR में बिना वजह देरी, विरोधाभासी मेडिकल राय, मौत के हत्या होने के बारे में अनिश्चितता और परिस्थितिजन्य सबूतों की अधूरी कड़ी के कुल असर पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपों को बिना किसी शक के साबित करने में विफल रहा।

    इसके अनुसार, उसने अपील स्वीकार की, अपीलकर्ता पर लगाई गई सजा और दोषसिद्धि को रद्द कर दिया और उसे सभी आरोपों से बरी किया।

    Case Title - Triveni And Other vs. State 2026 LiveLaw (AB) 503

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