लगातार अपमान भी आत्महत्या के लिए उकसावा हो सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Praveen Mishra

16 July 2026 4:45 PM IST

  • लगातार अपमान भी आत्महत्या के लिए उकसावा हो सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी व्यक्ति को लगातार इस तरह अपमानित किया जाए कि उसकी पारिवारिक जिंदगी और सम्मान प्रभावित हो, तो ऐसी परिस्थितियां आत्महत्या के लिए उकसावे (Abetment of Suicide) के दायरे में आ सकती हैं। इसी आधार पर अदालत ने अपनी कथित प्रेमिका के पति की आत्महत्या के मामले में आरोपी व्यक्ति को आरोपमुक्त (डिस्चार्ज) करने से इनकार कर दिया।

    जस्टिस संतोष राय की पीठ ने बरेली की विशेष एससी/एसटी अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें आरोपी चंद्रजीत सिंह की डिस्चार्ज अर्जी खारिज कर दी गई थी। आरोपी पर आईपीसी की धारा 306 (आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण) तथा एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज है।

    अभियोजन के अनुसार, मृतक सोमराज की शादी वर्ष 2017 में सह-आरोपी प्रिया उर्फ डॉली से हुई थी। आरोप है कि प्रिया के आरोपी चंद्रजीत और एक अन्य व्यक्ति गुलशन से अवैध संबंध थे। इसे लेकर पति-पत्नी के बीच अक्सर विवाद होता था। शिकायत के मुताबिक, समझाने के बावजूद आरोपी मृतक को लगातार मानसिक रूप से प्रताड़ित करते रहे, जिससे वह गहरे तनाव में आ गया।

    18 जून 2018 को सोमराज अपने कमरे में फंदे से लटका मिला। परिजनों को मौके से एक हस्तलिखित सुसाइड नोट मिला, जिसमें उसने अपनी पत्नी, चंद्रजीत और गुलशन को अपनी मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया था। बाद में फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) ने सुसाइड नोट की लिखावट की पुष्टि भी कर दी।

    हाईकोर्ट में आरोपी ने दलील दी कि घटना से दो-तीन दिन पहले उसका मृतक से कोई संपर्क नहीं था, इसलिए आत्महत्या के लिए उकसावे का आरोप नहीं बनता।

    हालांकि, अदालत ने यह तर्क स्वीकार करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण साबित करने के लिए यह जरूरी नहीं कि आरोपी घटना से ठीक पहले मृतक के संपर्क में रहा हो। यदि लगातार अपमान और मानसिक प्रताड़ना का सिलसिला किसी व्यक्ति को आत्महत्या की ओर धकेलता है, तो वह भी उकसावे की श्रेणी में आ सकता है।

    अदालत ने कहा कि सुसाइड नोट मामले का महत्वपूर्ण साक्ष्य है और उसमें लगातार अपमान और मानसिक प्रताड़ना का एक व्यवस्थित क्रम (systematic pattern of humiliation) सामने आता है। ऐसे में आरोपों की सत्यता, आरोपी की मंशा और आत्महत्या से उसके संबंध का अंतिम परीक्षण केवल ट्रायल के दौरान ही किया जा सकता है।

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने माना कि प्रथम दृष्टया आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है और आरोपी की आपराधिक अपील खारिज कर दी।

    Praveen Mishra

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    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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