कंबल-मच्छरदानी की बरामदगी से डकैती साबित नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2 आरोपियों को बरी किया
Praveen Mishra
18 Aug 2026 4:39 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब 48 साल पुराने 1978 के डकैती मामले में दो आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि केवल एक कंबल और मच्छरदानी की कथित बरामदगी से आरोपियों का अपराध साबित नहीं होता, खासकर जब ये सामान बाजार में आम तौर पर उपलब्ध हों और उन पर कोई विशिष्ट पहचान चिह्न न हो।
जस्टिस अब्दुल शाहिद की पीठ ने आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए कानपुर देहात के स्पेशल जज (DAA) द्वारा 1985 में सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया। दोनों आरोपियों को IPC की धारा 392 के तहत दोषी ठहराया गया था और पांच साल के कठोर कारावास के साथ ₹1,000 जुर्माने की सजा दी गई थी।
क्या था मामला?
अभियोजन के अनुसार, 11/12 अगस्त 1978 की रात चार बदमाश शिकायतकर्ता के भाई के घर में घुसे और डकैती के बाद फरार हो गए। FIR में तीन कंबल, एक सफेद मच्छरदानी, कपड़े, आभूषण, कलाई घड़ी, ट्रांजिस्टर, ₹700 नकद और पासबुक समेत कई सामान लूटे जाने का आरोप लगाया गया था।
जांच के दौरान आरोपियों से कथित तौर पर एक कंबल और एक मच्छरदानी बरामद की गई। अभियोजन ने यह भी दावा किया कि गवाहों ने टॉर्च और लालटेन की रोशनी में आरोपियों को देखा था।
पहचान परेड में देरी पर कोर्ट ने उठाए सवाल
हाईकोर्ट ने कहा कि गवाहों ने आरोपियों की पहचान टॉर्च की रोशनी में करने का दावा किया, लेकिन वह टॉर्च अदालत में पेश ही नहीं की गई। इसके अलावा, गवाहों ने घटना के तुरंत बाद आरोपियों का कोई विशिष्ट हुलिया भी नहीं बताया था।
कोर्ट ने Test Identification Parade (TIP) में हुई देरी को भी महत्वपूर्ण माना। घटना और आरोपियों की गिरफ्तारी के कई महीने बाद TIP कराई गई थी। कोर्ट ने कहा कि देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया और इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि TIP से पहले गवाह आरोपियों को देख चुके हों।
'कंबल और मच्छरदानी' मजबूत सबूत नहीं
बरामदगी पर कोर्ट ने कहा कि कंबल और मच्छरदानी आम तौर पर बाजार में उपलब्ध सामान हैं और उन पर कोई विशिष्ट पहचान चिह्न नहीं था। इसलिए उनकी बरामदगी मजबूत corroborative evidence नहीं मानी जा सकती।
कोर्ट ने पहचान संबंधी साक्ष्य, TIP में देरी और कथित बरामदगी को समग्र रूप से देखते हुए पाया कि अभियोजन आरोपियों के खिलाफ मामला उचित संदेह से परे साबित नहीं कर सका।
इसके बाद हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों को benefit of doubt देते हुए उनकी दोषसिद्धि और सजा रद्द कर दी तथा उन्हें मामले के सभी आरोपों से बरी कर दिया।


