ऑनलाइन लीगल रिसर्च डेटाबेस पर 18% GST को चुनौती देने वाली PIL खारिज, इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी—2017 से टैक्स लागू, अब अचानक क्यों उठाया सवाल?
Praveen Mishra
27 Oct 2026 1:49 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऑनलाइन लीगल रिसर्च और कानूनी शिक्षा से जुड़ी डेटा सेवाओं पर लगने वाले 18% Goods and Services Tax (GST) को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब यह टैक्स वर्ष 2017 से लागू है, तो याचिकाकर्ता अधिवक्ता को 2026 में अचानक इसकी दर अनुचित क्यों लगने लगी।
चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने अधिवक्ता अनिकेत गुप्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में यह नहीं बताया कि ऐसा क्या नया हुआ, जिसके कारण उन्हें अब इस टैक्स दर के अनुचित होने का एहसास हुआ, जबकि यह दर वर्ष 2017 से लागू है।
याचिका में क्या मांग की गई थी?
अधिवक्ता अनिकेत गुप्ता ने अपनी PIL में ऑनलाइन लीगल रिसर्च और कानूनी शैक्षणिक डेटाबेस सेवाओं को Service Accounting Code (SAC) 998431 के तहत वर्गीकृत किए जाने और उन पर कुल 18% GST लगाए जाने को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि इन सेवाओं के लिए अलग वर्गीकरण किया जाए और इन्हें GST से छूट या रियायती टैक्स दर का लाभ दिया जाए।
याचिका में कहा गया कि SCC Online, Manupatra और LexisNexis जैसे लीगल रिसर्च प्लेटफॉर्म तथा LiveLaw और Bar & Bench जैसी कानूनी समाचार सेवाएं कानूनी पेशे से जुड़े लोगों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
इन प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से अधिवक्ताओं को न्यायालयों के फैसलों, कानूनों, सरकारी अधिसूचनाओं और अन्य कानूनी दस्तावेजों तक पहुंच मिलती है।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि इन सेवाओं पर 18% GST लगाने से न्याय तक पहुंच प्रभावित होती है और विशेष रूप से जूनियर अधिवक्ताओं तथा छोटे वकीलों के चैंबर पर आर्थिक बोझ पड़ता है।
जूनियर वकीलों और छोटे चैंबर्स पर असर का दावा
याचिका में कहा गया कि आधुनिक कानूनी प्रैक्टिस में ऑनलाइन रिसर्च डेटाबेस महत्वपूर्ण कार्य-साधन बन चुके हैं। व्यक्तिगत अधिवक्ताओं और छोटे चैंबर्स के लिए इन डेटाबेस में उपलब्ध पूरी जानकारी को स्वयं जुटाना व्यावहारिक रूप से मुश्किल है।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि इन सेवाओं पर लगने वाला टैक्स उन अधिवक्ताओं पर अधिक बोझ डाल सकता है, जो इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ नहीं ले पाते।
याचिका में यह भी कहा गया कि अदालत में किसी फैसले का हवाला देने से पहले उसकी प्रामाणिकता और वैधता की जांच करना जरूरी है। यदि कोई अधिवक्ता किसी ऐसे फैसले का हवाला देता है, जिसे बाद में पलट दिया गया हो या जो फर्जी हो, तो इससे उसके पेशेवर दायित्वों पर सवाल उठ सकते हैं।
इस संदर्भ में याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के उन हालिया फैसलों और टिप्पणियों का भी हवाला दिया, जिनमें फर्जी या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार किए गए कानूनी संदर्भों की समस्या सामने आई थी।
याचिका के अनुसार, जब अधिवक्ताओं से हर कानूनी संदर्भ की पुष्टि करने की अपेक्षा की जाती है, तो विश्वसनीय रिसर्च डेटाबेस तक किफायती पहुंच भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
किताबों और ऑनलाइन डेटाबेस के टैक्स में अंतर का सवाल
याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि छपी हुई किताबों, लॉ रिपोर्ट्स, समाचार पत्रों और पत्रिकाओं को अपेक्षाकृत अनुकूल टैक्स व्यवस्था का लाभ मिलता है, जबकि ऑनलाइन कानूनी डेटाबेस पर 18% GST लगाया जाता है।
याचिका में कहा गया कि दोनों ही माध्यम कानूनी ज्ञान और जानकारी उपलब्ध कराने का काम करते हैं। ऐसे में इनके साथ अलग-अलग व्यवहार करना मनमाना और भेदभावपूर्ण है।
इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के साथ-साथ अनुच्छेद 38 और 39A का हवाला देते हुए टैक्स वर्गीकरण को चुनौती दी।
याचिका में केंद्र सरकार, केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) और GST Council को संबंधित टैक्स दर तथा वर्गीकरण पर दोबारा विचार करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
वैकल्पिक रूप से, याचिकाकर्ता ने अपनी शिकायत GST Council और उसकी Fitment Committee के सामने विचार के लिए रखने की मांग भी की थी।
हाईकोर्ट ने PIL क्यों खारिज की?
हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिका पर विचार करते हुए याचिकाकर्ता के टैक्स दर को चुनौती देने के समय पर सवाल उठाया।
अदालत ने गौर किया कि याचिकाकर्ता वर्ष 2020 में अधिवक्ता के रूप में नामांकित हुए थे और अपनी याचिका में पिछले छह वर्षों से प्रैक्टिस करने का दावा कर रहे थे।
खंडपीठ ने टिप्पणी की कि जब संबंधित टैक्स दर वर्ष 2017 से लागू है, तो याचिकाकर्ता को वर्ष 2026 में अचानक यह दर अनुचित क्यों लगने लगी, इसका कोई स्पष्ट कारण याचिका में नहीं बताया गया।
अदालत ने कहा कि इस तरह अचानक टैक्स दर को अनुचित मानकर जनहित याचिका दाखिल करने के पीछे का आधार स्पष्ट नहीं है।
इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने PIL खारिज कर दी।
मामले में मुख्य बात यह है कि याचिकाकर्ता ने ऑनलाइन कानूनी रिसर्च सेवाओं पर 18% GST को चुनौती देते हुए इसे किफायती न्याय और कानूनी पेशे से जुड़ा मुद्दा बताया था, लेकिन हाईकोर्ट ने टैक्स दर को चुनौती देने के समय और उसके कारण पर सवाल उठाते हुए याचिका खारिज कर दी।

