इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गर्भवती नाबालिग की असंवेदनशील काउंसलिंग के लिए मेडिकल बोर्ड को फटकारा, बताया- चौंकाने वाला
Shahadat
17 March 2026 8:41 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते मेडिकल बोर्ड और चीफ मेडिकल ऑफिसर (CMO), हाथरस को तब फटकारा, जब वे एक समय-संवेदनशील रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में लगभग 30 हफ़्ते की गर्भावस्था के उन्नत चरण में गर्भपात की मांग की गई थी, जिस पर कोर्ट ने नाबालिग पीड़िता के प्रति उनकी असंवेदनशीलता पर नाराज़गी जताई।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी की:
"आज, याचिकाकर्ता के वकील ने अपने मुवक्किल से मिले निर्देशों के आधार पर कोर्ट को सूचित किया कि मेडिकल बोर्ड बस उसके पास गया और उससे कहा, 'आपका ख्याल रखा जाएगा'। इसके अलावा कुछ नहीं कहा; और अब उपर्युक्त रिपोर्ट जमा कर दी गई, जो मेडिकल बोर्ड की असंवेदनशीलता को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।"
बता दें, कोर्ट ने पहले CMO, हाथरस को 'युद्ध स्तर' पर एक मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया था। इस बोर्ड को याचिकाकर्ता को गर्भपात की स्थिति में उसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले परिणामों के बारे में परामर्श देना था। साथ ही यह भी समझाना था कि यदि वह बच्चे को जन्म देने का विकल्प चुनती है तो उस पर न तो चिकित्सा खर्च की कोई ज़िम्मेदारी होगी और न ही बच्चे की, जिसे गोद दे दिया जाएगा; और इसकी पूरी ज़िम्मेदारी राज्य की होगी।
कोर्ट ने गौर किया कि विशिष्ट निर्देशों के बावजूद, "मेडिकल बोर्ड की जो रिपोर्ट हमारे सामने रखी गई, उसमें हीमोग्लोबिन, ब्लड ग्रुप, HIV, HBs, Ag, और HCV से संबंधित जांचों के अलावा; और भ्रूण की गर्भावस्था की अवधि से संबंधित जांचों के अलावा, कहीं भी यह संकेत नहीं मिलता कि याचिकाकर्ता ने गर्भपात करवाने या गर्भावस्था जारी रखने की अपनी इच्छा के बारे में क्या कहा था।"
यह देखते हुए कि पहले याचिकाकर्ता के वकील ने इस बात पर चिंता जताई कि यदि हाईकोर्ट द्वारा कोई सदस्य नामित नहीं किया जाता है तो पैनल असंवेदनशील हो सकता है, कोर्ट ने पाया कि मेडिकल बोर्ड ने वास्तव में असंवेदनशील तरीके से काम किया।
परिणामस्वरूप, कोर्ट ने J.N. कॉलेज अस्पताल, AMU, अलीगढ़ के प्रिंसिपल को एक आवश्यक पक्ष के रूप में शामिल करने का निर्देश दिया।
इसने DALSA, हाथरस के सचिव को तत्काल एक बैठक आयोजित करने और पहले से गठित मेडिकल बोर्ड में J.N. कॉलेज, अलीगढ़ के प्रिंसिपल के परामर्श से मनोवैज्ञानिक को शामिल करने का निर्देश दिया। DALSA के सचिव को इस बैठक की अध्यक्षता करने और बोर्ड को यह समझाने का निर्देश दिया गया कि पीड़िता को गोद लेने के संबंध में उसके विकल्पों के बारे में विस्तार से जानकारी दी जानी चाहिए। साथ ही मेडिकल खर्च, गोद लेने और बच्चे के भरण-पोषण की पूरी ज़िम्मेदारी राज्य द्वारा वहन की जाएगी।
नवगठित मेडिकल बोर्ड को याचिकाकर्ता से मिलने और नई मेडिकल रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया गया।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि एक बार जब नई रिपोर्ट तैयार हो जाए और उसे एक सीलबंद लिफाफे में रख दिया जाए तो पूरा मेडिकल बोर्ड, जिसमें DALSA, हाथरस के सचिव और CMO, हाथरस शामिल हैं, अदालत के समक्ष उपस्थित रहेगा।
अदालत ने हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज़ कमेटी के वकील को भी निम्नलिखित मामलों पर स्पष्टीकरण देने और एक हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया:
"(i) क्या लीगल सर्विसेज़ कमेटी के लिए यह संभव है कि वह हर ज़िले में DALSA के सचिव को मेडिकल बोर्ड का पदेन अध्यक्ष नामित करे? यह मेडिकल बोर्ड उन मामलों में रिपोर्ट देने के उद्देश्य से बनाया जा सकता है, जहाँ गर्भपात से जुड़े मुद्दों पर विचार किया जाना हो।
या
(ii) क्या लीगल सर्विसेज़ कमेटी के किसी पैनल वकील को नियुक्त करना संभव है, जो उपर्युक्त कमेटी के कार्यों का समन्वय करे और उसकी अध्यक्षता करे। साथ ही सीधे संबंधित अदालत को रिपोर्ट करे? यह उन मामलों में किया जा सकता है, जहां गर्भपात के लिए याचिकाएं विचाराधीन हों और मेडिकल बोर्ड से रिपोर्ट मांगने का निर्देश जारी किया गया हो।"

