9 साल जेल में बिताने के बाद रेप आरोपी को राहत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 8 साल की पीड़िता के बयान में विरोधाभास का हवाला देते हुए किया बरी
Shahadat
22 Jun 2026 8:17 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक ऐसे व्यक्ति को बरी किया, जिसने 8 साल की बच्ची के साथ रेप और POCSO Act के तहत अपराध करने के आरोप में 9 साल से ज़्यादा जेल में बिताए।
नाबालिग पीड़िता के बयान में विरोधाभास और बदलाव, उसके पिता के व्यवहार और मामले की पुष्टि करने वाले मेडिकल सबूतों की कमी को देखते हुए जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की बेंच ने ट्रायल कोर्ट के 2019 के उस फैसले को रद्द किया, जिसमें आरोपी को उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई।
बेंच ने अपने फैसले में कहा,
"पुष्टि करने वाले ठोस मेडिकल सबूतों की कमी और बच्ची (गवाह) के बयान में बदलाव और मामले की अन्य परिस्थितियों - जिसमें पीड़िता के पिता के बयान भी शामिल हैं - को देखते हुए आरोपी-अपीलकर्ता की सज़ा को बरकरार रखना बहुत असुरक्षित होगा।"
मामले का संक्षिप्त विवरण
कोर्ट ने पाया कि पीड़िता के पिता (PW-2/शिकायतकर्ता) ने शुरू में मई 2017 में एक नॉन-कॉग्निज़ेबल रिपोर्ट (NCR) दर्ज कराई, जिसमें केवल यह आरोप लगाया गया कि अपीलकर्ता ने पीड़िता का गला दबाया, जिससे वह बेहोश हो गई।
इसके बाद IPC की धारा 323 के तहत मामला दर्ज किया गया, जिसे बाद में पीड़िता के पिता (शिकायतकर्ता) ने IPC की धारा 354B के तहत छेड़छाड़ के मामले में बदल दिया।
इसके बाद जांच के दौरान, CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज पीड़िता के बयान के आधार पर मामले में IPC की धारा 376 के तहत रेप का गंभीर अपराध भी जोड़ा गया।
जांच पूरी होने के बाद आरोपी कुंतेश के खिलाफ IPC की धारा 323 और 376 और POCSO Act की धारा 3 और 4 के तहत चार्जशीट दाखिल की गई।
जनवरी 2019 में ट्रायल कोर्ट ने उसे दोषी ठहराया। इस फैसले और सज़ा को चुनौती देते हुए वह हाईकोर्ट पहुंचा। अहम बात यह है कि ट्रायल और अपील लंबित रहने के दौरान आरोपी हिरासत में ही रहा। हाईकोर्ट में उनका पक्ष यह था कि पुरानी दुश्मनी की वजह से उन्हें इस मामले में झूठा फंसाया गया।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
अपील और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट को अभियोजन पक्ष की कहानी में बड़ी कमियां मिलीं, जिन्होंने उस कहानी को "बुरी तरह से कमजोर" किया।
बेंच ने अभियोजन पक्ष के मामले में एक बड़ी कमी पर ध्यान दिया: हालांकि पीड़िता घटना के बारे में शुरुआती रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए अपने पिता के साथ पुलिस स्टेशन गई, लेकिन शिकायत में "यौन उत्पीड़न के बारे में कोई ज़िक्र नहीं था"।
हालांकि, कोर्ट ने माना कि यौन अपराधों की रिपोर्ट करने में देरी का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि मामला खारिज हो जाएगा (क्योंकि इससे जुड़े सामाजिक कलंक की वजह से ऐसा हो सकता है), लेकिन इस मामले की परिस्थितियां पूरी तरह अलग थीं।
खास बात यह है कि कोर्ट ने बताया कि सालों बाद ट्रायल कोर्ट के सामने बयान देते समय भी पिता/शिकायतकर्ता ने अपनी गवाही को केवल शारीरिक हमले की अपनी मूल लिखित शिकायत तक ही सीमित रखा, और उन्होंने कभी भी बलात्कार के बारे में कोई आरोप नहीं लगाया।
पिता ने साफ तौर पर माना कि उन्होंने पुलिस को वही घटना बताई, जो उनकी बेटी ने उन्हें बताई।
कोर्ट ने माना कि शुरुआती मौके पर ही इस अहम जानकारी को न बताना "अभियोजन पक्ष के मामले की शुरुआत पर ही शक का गहरा साया डालता है"।
इसके अलावा, कोर्ट को 8 साल की पीड़िता की गवाही में भी विसंगतियां मिलीं।
डिविजन बेंच ने ध्यान दिया कि CrPC की धारा 161 के तहत पुलिस को दिए अपने शुरुआती बयान में नाबालिग ने केवल यह आरोप लगाया कि आरोपी ने उसके साथ "गंदी बात" की थी और किसी शारीरिक या यौन हरकत का आरोप नहीं लगाया।
हालांकि, बलात्कार का आरोप बहुत बाद में जब मजिस्ट्रेट के सामने CrPC की धारा 164 के तहत उसका बयान दर्ज किया गया, तब पहली बार एक बड़े बदलाव के तौर पर सामने आया।
'पंछी और अन्य बनाम यूपी राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने ज़ोर दिया कि बच्चे गवाह के बयान का मूल्यांकन ज़्यादा सावधानी और सतर्कता से किया जाना चाहिए, क्योंकि बच्चा दूसरों की बातों से आसानी से प्रभावित हो सकता है। इस तरह उसे आसानी से सिखा-पढ़ाकर गलत बयान दिलवाया जा सकता है।
पीड़िता के बयानों में किए गए बदलावों को देखते हुए कोर्ट ने माना कि पीड़िता को "बेहतरीन गवाह" (sterling witness) का दर्जा देना बहुत मुश्किल है, जिसके बयान की पुष्टि की ज़रूरत न हो।
इस संबंध में बेंच ने 'उर्मिला देवी बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य' मामले में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के हालिया फ़ैसले का ज़िक्र किया। इसमें कहा गया कि जब कोई पीड़िता "अपने बयानों में धीरे-धीरे बदलाव करती है तो यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि उसका कौन सा बयान भरोसेमंद और विश्वसनीय है।"
कोर्ट ने इस मामले में पक्के तौर पर पुष्टि करने वाले मेडिकल सबूतों की कमी पर भी ध्यान दिया।
कोर्ट ने कहा:
"...रिकॉर्ड पर मौजूद मेडिकल रिपोर्ट पीड़िता द्वारा बताए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों को पक्के तौर पर साबित या मेडिकल रूप से पुष्ट नहीं करती हैं। कोई अंदरूनी या बाहरी चोट न होना, हाइमन का सुरक्षित होना और सीमन (वीर्य) का बिल्कुल न मिलना - इन बातों को मामले की अन्य परिस्थितियों के साथ देखने पर अभियोजन पक्ष के मामले पर शक पैदा होता है।"
इन हालात को देखते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि मामले की परिस्थितियों, पीड़िता के बदलते बयानों और उसके पिता के व्यवहार ने अभियोजन पक्ष की कहानी को बहुत संदिग्ध बना दिया।
इस बात पर ज़ोर देते हुए कि जब किसी मामले में पेश किए गए सबूतों पर दो राय हो सकती हैं तो आरोपी के पक्ष वाली राय को ही माना जाना चाहिए, बेंच ने आरोपी को बरी कर दिया। उसे संदेह का लाभ (benefit of doubt) दिया गया और उसकी अपील मंज़ूर कर ली गई।
नतीजतन, आरोपी (कुंतेश) को - जो मई 2017 में अपनी गिरफ़्तारी के बाद से ज़मानत न मिल पाने के कारण 9 साल से जेल में था - तुरंत हिरासत से रिहा करने का आदेश दिया गया।
Case title - Kuntesh vs State of UP 2026 LiveLaw (AB) 328

