मकान-मालिक के साथ बिक्री का समझौता करने से किरायेदारी खत्म नहीं होती और न ही किरायेदार का कब्ज़ा 'पार्ट परफॉर्मेंस' में बदलता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
18 Sept 2026 1:32 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई किरायेदार अपने मकान-मालिक से किराये पर ली गई प्रॉपर्टी खरीदने का समझौता करता है तो सिर्फ़ समझौता करने से किरायेदारी खत्म नहीं होती और न ही इससे किरायेदार का कब्ज़ा 'ट्रांसफर ऑफ़ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882' की धारा 53-A के तहत समझौते के आंशिक पालन (पार्ट परफॉर्मेंस) के तौर पर माना जाता है।
कोर्ट ने कहा कि किरायेदार को यह साबित करना होगा कि किरायेदारी को साफ़ तौर पर या इशारों में खत्म (सरेंडर) कर दिया गया और उसके बाद उसका कब्ज़ा बिक्री के समझौते के आधार पर था।
जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कहा,
"जब कोई व्यक्ति पहले से ही किरायेदार के तौर पर अचल संपत्ति (Immovable Property) पर कब्ज़ा रखता है और बाद में मकान-मालिक से प्रॉपर्टी खरीदने का समझौता करता है तो बिक्री का समझौता सिर्फ़ बनने से ही मौजूदा किरायेदारी खत्म नहीं होती और न ही किरायेदार का कब्ज़ा समझौते के आंशिक पालन के तौर पर कब्ज़े में बदलता है।"
कोर्ट ने कहा कि ऐसे बदलाव को मानने के लिए ठोस सबूत होने चाहिए, जिनसे पता चले कि बाद का कब्ज़ा बिक्री के समझौते से जुड़ा था और पहले से चली आ रही किरायेदारी को साफ़ तौर पर या इशारों में खत्म कर दिया गया या कानून के मुताबिक खत्म किया गया।
कोर्ट ने आगे कहा,
"सिर्फ़ पैसे का भुगतान और भौतिक कब्ज़े का बने रहना काफ़ी नहीं है।"
वादी-मकान-मालिक ने 2019 में कानपुर नगर की स्मॉल कॉज़ेज़ कोर्ट में एक मुक़दमा दायर किया। इसमें प्रतिवादियों को एक दुकान से बेदखल करने की मांग की गई, क्योंकि उन्होंने 01.01.2003 से 31.08.2019 तक किराया नहीं दिया। यह दलील दी गई कि 01.09.2019 के नोटिस से किरायेदारी खत्म कर दी गई। चूंकि मासिक किराया 3,000 रुपये था, इसलिए किरायेदारी 'उत्तर प्रदेश शहरी भवन (किराये पर देने, किराया और बेदखली का नियमन) अधिनियम, 1972' के दायरे में नहीं आती थी।
मुक़दमे के चलने के दौरान, मूल वादी की जगह उसके कानूनी उत्तराधिकारियों को शामिल किया गया। प्रतिवादियों ने दलील दी कि 24.12.2002 को बिक्री का समझौता और कब्ज़ा सौंपने का एक अलग पत्र तैयार किया गया, और समझौते के आंशिक पालन के तहत उन्हें दुकान का कब्ज़ा दे दिया गया। यह तर्क दिया गया कि इसलिए मकान मालिक-किरायेदार का रिश्ता खत्म हो गया और बेदखली का मुकदमा चलाने लायक नहीं था।
स्मॉल कॉज़ कोर्ट ने 14.05.2026 को मुकदमा उनके खिलाफ़ तय किया। इससे नाराज़ होकर, प्रतिवादियों ने प्रोविंशियल स्मॉल कॉज़ कोर्ट्स एक्ट, 1887 की धारा 25 के तहत एक रिविज़न याचिका दायर की।
रिविज़न याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि हालांकि वे 24.12.2002 से पहले किरायेदार थे, लेकिन समझौते के बाद उनके कब्ज़े का स्वरूप बदल गया। यह तर्क दिया गया कि बिक्री समझौते, कब्ज़ा पत्र और 1,10,000 रुपये की पूरी बिक्री राशि के भुगतान को एक साथ पढ़ा जाना चाहिए। ट्रायल कोर्ट ने गलत तरीके से उन्हें धारा 53-A के तहत सुरक्षा देने से इनकार किया।
प्रतिवादियों के वकील ने कहा कि बिक्री के रजिस्टर्ड समझौते में ही यह दर्ज था कि कब्ज़ा नहीं दिया गया और बिक्री विलेख (सेल डीड) के निष्पादन के समय इसे सौंपा जाएगा। यह कहा गया कि कब्ज़ा पत्र बिना रजिस्ट्रेशन वाला और विवादित था, और इसके किसी भी गवाह से पूछताछ नहीं की गई।
कोर्ट ने देखा कि चूंकि प्रतिवादी पहले से ही किरायेदार के तौर पर कब्ज़े में थे, इसलिए उनका भौतिक कब्ज़ा अकेले उन्हें समझौते से नहीं जोड़ सकता।
“समझौते से पहले और बाद में भौतिक कब्ज़ा लगातार बना रहा। जो साबित करने की ज़रूरत है, वह है उस कब्ज़े के कानूनी आधार में बदलाव। जब तक ऐसा बदलाव साबित नहीं हो जाता, तब तक कब्ज़े के बने रहने को आम तौर पर उसी रिश्ते से जोड़कर देखा जाना चाहिए जिसके तहत कब्ज़ा मूल रूप से प्राप्त किया गया।”
नाज़िम शेख हसन बनाम नासिर मुश्ताक शेख और अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि मकान मालिक और उसके किरायेदार के बीच बिक्री का समझौता अपने आप किरायेदारी को खत्म नहीं करता है। कोर्ट ने माना कि किरायेदारी तभी खत्म होती है जब समझौते की शर्तें या पार्टियों का स्पष्ट व्यवहार ट्रांसफर ऑफ़ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 111(e) या धारा 111(f) के तहत स्पष्ट या निहित समर्पण (surrender) को दर्शाता हो।
इसी बात को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने कहा कि रजिस्टर्ड एग्रीमेंट में लिखी यह बात कि सेल डीड बनने पर कब्ज़ा सौंपा जाएगा, प्रतिवादियों के इस दावे के बिल्कुल उलट थी कि उन्हें 24.12.2002 को कब्ज़ा मिल गया। कोर्ट ने माना कि कब्ज़े से जुड़ा लेटर साबित नहीं हो पाया क्योंकि उसके गवाहों से कभी पूछताछ नहीं की गई।
कोर्ट ने देखा कि 2016 से प्रतिवादियों द्वारा जमा किए गए किराए का ब्योरा उनके इस दावे से मेल नहीं खाता कि किरायेदारी 2002 में खत्म हो गई और 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' के लिए उनके द्वारा शुरू की गई कानूनी कार्यवाही से पता चलता था कि उनके पास सेल डीड बनवाने का सिर्फ़ एक कॉन्ट्रैक्ट वाला अधिकार था।
पूरी रकम का भुगतान होने पर कोर्ट ने कहा,
“बेचने का एग्रीमेंट भले ही उसके तहत पूरी रकम का भुगतान कर दिया गया हो, प्रॉपर्टी का मालिकाना हक ट्रांसफर करने (कन्वेयंस) जैसा नहीं होता है।”
कोर्ट ने इस दलील को भी खारिज किया कि 01.09.2019 का नोटिस गलत था क्योंकि उसमें मांगे गए किराए का कुछ हिस्सा 'टाइम-बार्ड' (कानूनी समय-सीमा से बाहर) हो चुका था। कोर्ट ने कहा कि समय-सीमा (लिमिटेशन) का नियम सिर्फ़ बकाया वसूली को रोकता है, कर्ज को खत्म नहीं करता और नोटिस से मकान-मालिक का किराएदारी खत्म करने का इरादा साफ पता चलता है।
आगे कहा गया,
“इसलिए समय-सीमा से जुड़ी आपत्ति, रिवीजन करने वालों से कानूनी तौर पर वसूले जा सकने वाले बकाया की रकम तय करते समय तो मायने रख सकती है, लेकिन इस मामले के तथ्यों के आधार पर, यह 01.09.2019 के नोटिस को पूरी तरह से गलत ठहराने का आधार नहीं बनती।”
यह मानते हुए कि बेचने के एग्रीमेंट के बावजूद किराएदारी जारी रही और नोटिस के ज़रिए उसे सही तरीके से खत्म किया गया, कोर्ट ने रिवीजन याचिका खारिज कर दी और स्मॉल कॉज़ेज़ कोर्ट का फैसला और डिक्री बरकरार रखा।
Case Title: Rajesh Kumar Chaurasia and 2 others v. Suresh Kapoor and 3 others

