घटना के समय 2 दोषी थे नाबालिग: हत्या के मामले में सजा मिलने के 45 साल बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट को चला पता, मामला JJB को भेजा
Shahadat
16 Oct 2026 10:28 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को 1980 के एक हत्या मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे 2 लोगों की सजा रद्द की। कोर्ट ने पाया कि अपराध के समय वे नाबालिग थे। ट्रायल कोर्ट द्वारा सजा सुनाए जाने के लगभग 45 साल बाद यह बात सामने आई है।
जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की बेंच ने उनके दोषसिद्धि (Conviction) को तो बरकरार रखा, लेकिन सजा तय करने का मामला संबंधित किशोर न्याय बोर्ड (JJB) को सौंप दिया, ताकि कानून के अनुसार उन्हें उचित सजा दी जा सके।
कोर्ट ने कहा कि यह घटना उस समय हुई, जब 'किशोर न्याय अधिनियम, 1986' (Juvenile Justice Act, 1986) लागू था। कोर्ट ने माना कि "उन्हें केवल वही सजा दी जानी चाहिए, जो किशोर न्याय अधिनियम, 1986 के तहत तय की गई सजा से अधिक न हो।"
सुप्रीम कोर्ट के 'मुमताज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2016)' मामले के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा,
"अगर कोई नाबालिग अपराध का दोषी पाया जाता है तो उसे बिना सजा के नहीं छोड़ा जा सकता। लेकिन उसे क्या सजा दी जाए, यह तय करने का काम इस अधिनियम के तहत गठित किशोर न्याय बोर्ड पर छोड़ दिया जाना चाहिए।"
बेंच ने सिराज अहमद और अब्दुल वाहिद द्वारा दायर अपील आंशिक रूप से स्वीकार की और उन्हें 28 अक्टूबर, 2026 को JJB के सामने पेश होने का निर्देश दिया। बोर्ड को 6 सप्ताह के भीतर अपना आदेश पारित करने के लिए कहा गया।
मामले का संक्षिप्त विवरण
हाईकोर्ट, सुल्तानपुर के सेशन जज द्वारा दिसंबर 1981 में हत्या के एक मामले में दिए गए फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रहा था।
अभियोजन पक्ष का आरोप है कि पुरानी रंजिश के कारण, 28 सितंबर 1980 को आरोपियों ने शिकायतकर्ता पक्ष पर हमला कर दिया था। इस हमले में एक व्यक्ति की मौत हो गई और अन्य लोग घायल हो गए।
अंततः, यह अपील केवल अहमद और वाहिद के मामले में ही बची रही, क्योंकि अन्य आरोपियों के खिलाफ दायर अपीलें पहले ही समाप्त (Abate) हो चुकी थीं।
अपील पर सुनवाई के दौरान, दोनों अपीलकर्ताओं ने दावा किया कि घटना के समय वे नाबालिग थे। हाईकोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (किशोर न्याय बोर्ड) को उनकी उम्र की जांच करने का निर्देश दिया।
बोर्ड ने अहमद के संबंध में 2 फरवरी 2017 को और वाहिद के संबंध में 27 नवंबर 2023 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट और उससे जुड़े दस्तावेजों की जांच करने के बाद कोर्ट ने उनकी जन्म तिथियों को क्रमशः 25 नवंबर 1962 और 25 अक्टूबर 1962 के रूप में स्वीकार किया।
इसके आधार पर कोर्ट ने पाया कि घटना के समय अहमद की उम्र 17 साल, 10 महीने और 3 दिन थी, जबकि वाहिद की उम्र 17 साल, 11 महीने और 3 दिन थी। इसलिए, कोर्ट ने माना कि अपराध के समय दोनों अपीलकर्ता नाबालिग (जुवेनाइल) थे।
अहमद के मामले में दस्तावेजों में प्राइमरी स्कूल मवैया में कक्षा 1 से 5 तक और रसूलबाद के हनफी इंटर कॉलेज में कक्षा 6 से 8 तक की पढ़ाई से जुड़े शैक्षणिक प्रमाण पत्र शामिल थे। उसने अपना आधार कार्ड, 1975 का कक्षा 5 पास करने का प्रमाण पत्र और स्कूल के रिकॉर्ड भी पेश किए।
हालांकि, शिकायतकर्ता के बेटे ने बोर्ड के सामने इन शैक्षणिक प्रमाण पत्रों पर आपत्ति जताई, लेकिन अभियोजन पक्ष ने इन आपत्तियों के समर्थन में कोई गवाह पेश नहीं किया। इसलिए बोर्ड ने इन दस्तावेजों को असली माना।
वाहिद के मामले में बोर्ड ने स्कूल रजिस्टर, कक्षा 5 का ट्रांसफर सर्टिफिकेट, हाई स्कूल की क्रॉस-लिस्ट और उत्तर प्रदेश बोर्ड परीक्षा में उसके कक्षा 10 के रोल नंबर से जुड़े सबूतों पर विचार किया। कोर्ट ने भी इन दस्तावेजों को असली पाया।
हाई कोर्ट के सामने अपीलकर्ताओं के वकील ने उनकी दोषसिद्धि (कनविक्शन) को चुनौती नहीं दी, बल्कि उनकी सजा रद्द करने की मांग की और अनुरोध किया कि मामले को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के पास भेजा जाए। अतिरिक्त सरकारी वकील ने इस अनुरोध पर कोई आपत्ति नहीं जताई।
अभियोजन पक्ष के सबूतों की जांच करने पर, जिसमें घायल चश्मदीदों और अन्य चश्मदीदों के बयान शामिल थे, कोर्ट को ट्रायल कोर्ट के दोषी ठहराने के फैसले में दखल देने का कोई आधार नहीं मिला। इसलिए उनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया। हालांकि, अदालत ने 'जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2000' की धारा 7A पर विचार किया, जो किसी मामले के अंतिम निपटारे के बाद भी नाबालिग होने का दावा पेश करने की अनुमति देती है।
अदालत ने 'जितेंद्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2013)' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया।
चूंकि अपराध उस समय हुआ था जब 'जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 1986' लागू था, इसलिए अदालत ने माना कि सजा 1986 के अधिनियम में तय की गई सजा से अधिक नहीं हो सकती।
परिणामस्वरूप, अदालत ने दोनों अपीलकर्ताओं को सुनाई गई सजा रद्द की और मामले को 'जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड' (JJB) के पास भेज दिया, ताकि 'जितेंद्र सिंह' मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार उचित सजा तय की जा सके।
Case Title : Ali Hasan vs. State of UP 2026 LiveLaw (AB) 846

