2026 CLAT-UG | इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फ़ाइनल आंसर-की बहाल की, मेरिट लिस्ट में बदलाव के सिंगल जज का निर्देश रद्द किया

Shahadat

8 May 2026 8:06 PM IST

  • 2026 CLAT-UG | इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फ़ाइनल आंसर-की बहाल की, मेरिट लिस्ट में बदलाव के सिंगल जज का निर्देश रद्द किया

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस साल फ़रवरी में सिंगल जज द्वारा दिए गए आदेश को रद्द किया। इस आदेश में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज़ के कंसोर्टियम को कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट (CLAT) यूजी 2026 के लिए मेरिट लिस्ट में बदलाव करने का निर्देश दिया गया था।

    ऐसा करके जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की डिवीज़न बेंच ने वास्तव में 16 दिसंबर, 2025 को कंसोर्टियम द्वारा जारी की गई फ़ाइनल आंसर-की को बहाल किया। यह आंसर-की एक्सपर्ट कमेटियों द्वारा उठाई गई आपत्तियों की समीक्षा करने के बाद जारी की गई थी।

    इस तरह बेंच ने सिंगल जज के आदेश के ख़िलाफ़ कंसोर्टियम की अपील स्वीकार की। बेंच ने यह टिप्पणी की कि शैक्षणिक मामलों में विषय विशेषज्ञों के फ़ैसलों पर कोर्ट अपीलीय प्राधिकरण के तौर पर काम नहीं कर सकते।

    संक्षेप में मामला

    CLAT-UG के उम्मीदवार ने सिंगल जज के सामने रिट याचिका दायर की थी। इसमें सेट-सी के प्रश्न संख्या 6, 9 और 13 की फ़ाइनल आंसर-की को चुनौती दी गई। 3 फ़रवरी 2026 को, सिंगल जज ने याचिका आंशिक रूप से स्वीकार की थी।

    सिंगल जज ने यह पाया था कि प्रश्न संख्या 9 के लिए विषय विशेषज्ञ कमेटी ने दो सही विकल्पों की सिफ़ारिश की थी, लेकिन ओवरसाइट कमेटी ने बिना कोई कारण बताए इस सिफ़ारिश को रद्द किया था।

    इसके परिणामस्वरूप, सिंगल जज ने कंसोर्टियम को निर्देश दिया कि वह प्रश्न संख्या 9 के लिए विकल्प 'B' और 'D' दोनों को सही माने और बाद के काउंसलिंग राउंड के लिए एक संशोधित मेरिट लिस्ट प्रकाशित करे।

    इससे असंतुष्ट होकर कंसोर्टियम ने डिवीज़न बेंच के सामने विशेष अपील दायर की। इसका उद्देश्य अपने फ़ाइनल मूल्यांकन को बहाल करना और सिंगल जज के निर्देश को रद्द करवाना था। मूल याचिकाकर्ता ने भी एक संबंधित अपील दायर की, जिसमें शेष विवादित प्रश्नों (टेस्ट बुकलेट-C के प्रश्न संख्या 6 और 13) पर और राहत की मांग की गई।

    हाईकोर्ट का आदेश

    कंसोर्टियम की अपील स्वीकार करते हुए डिवीज़न बेंच ने आज यह टिप्पणी की कि फ़ाइनल आंसर-की एक व्यवस्थित और बहु-स्तरीय जांच प्रक्रिया का परिणाम थी। इस प्रक्रिया में विषय विशेषज्ञों और एक ओवरसाइट कमेटी को शामिल करते हुए दो-स्तरीय जांच तंत्र का उपयोग किया गया।

    न्यायालय ने राय दी,

    "संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों द्वारा किया गया ऐसा अभ्यास सही होने की एक मज़बूत धारणा स्थापित करता है, विशेष रूप से शैक्षणिक मामलों में, जब तक कि कोई स्पष्ट और सिद्ध करने योग्य त्रुटि स्थापित न हो जाए।"

    न्यायालय ने विशेष रूप से यह नोट किया कि मूल याचिकाकर्ता द्वारा शुरू में जिन तीनों विवादित प्रश्नों पर आपत्ति जताई गई [सेट-C के प्रश्न संख्या 6, 9 और 13], उनके जो उत्तर अंतिम रूप से स्वीकार किए गए, वे "प्रश्नों की एक संभावित और उचित व्याख्या" थे।

    महत्वपूर्ण रूप से, प्रश्न संख्या 9 का विश्लेषण करते समय—जो एकमात्र ऐसा प्रश्न था, जिसमें सिंगल जज ने हस्तक्षेप किया—खंडपीठ ने पाया कि कंसोर्टियम का उत्तर (विकल्प 'D') ही एकमात्र ऐसा उत्तर था, जो "निगमनात्मक तर्क के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप" था।

    न्यायालय ने नोट किया कि यह प्रदर्शित नहीं किया जा सका कि कंसोर्टियम द्वारा अंतिम रूप दिए गए उत्तरों में कोई 'स्पष्ट त्रुटि' थी, या वे इस प्रकार के थे कि कोई भी उचित विशेषज्ञ उन तक नहीं पहुंच सकता था।

    अपने 19-पृष्ठ के निर्णय में न्यायालय ने शैक्षणिक मामलों में न्यायिक समीक्षा के सीमित दायरे पर ज़ोर दिया। न्यायालय ने नोट किया कि ऐसा हस्तक्षेप केवल तभी उचित ठहराया जा सकता है, जब उत्तर स्पष्ट रूप से गलत या पूरी तरह से अनुचित सिद्ध हो जाए; वर्तमान मामले में ऐसा नहीं था।

    खंडपीठ ने यह टिप्पणी की कि न्यायालय विषय विशेषज्ञों के निर्णयों पर अपीलीय प्राधिकारी के रूप में कार्य नहीं कर सकते, क्योंकि मूल्यांकन के ऐसे मामलों में न्यायिक समीक्षा केवल "बहुत ही संकीर्ण दायरे" के अंतर्गत ही उपलब्ध होती है।

    इस संबंध में पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों रण विजय सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2017) और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग बनाम राहुल सिंह (2018) का भी संदर्भ लिया, जिनमें यह निर्धारित किया गया कि न्यायालयों को उत्तर-कुंजियों के मूल्यांकन से जुड़े मामलों में संयम बरतना चाहिए और विशेषज्ञों की राय पर अपीलीय प्राधिकारी के रूप में कार्य नहीं करना चाहिए।

    पीठ ने टिप्पणी की,

    "कानून की स्थापित स्थिति यह स्पष्ट करती है कि न्यायालयों को विषय विशेषज्ञों की राय के स्थान पर अपनी स्वयं की राय थोपने से बचना चाहिए। यहां तक कि जहां दो अलग-अलग दृष्टिकोण संभव हों, वहाँ भी अंतिम शैक्षणिक प्राधिकारी द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण को ही सामान्यतः वरीयता दी जानी चाहिए, बशर्ते कि वह शैक्षणिक तर्क पर आधारित एक संभावित दृष्टिकोण हो।"

    मामले के इस परिप्रेक्ष्य में हाईकोर्ट ने यह राय व्यक्त की कि सिंगल जज द्वारा किया गया हस्तक्षेप—भले ही वह सद्भावनापूर्ण रहा हो—शैक्षणिक मामलों में न्यायिक समीक्षा को नियंत्रित करने वाले स्थापित मानदंडों के अनुरूप नहीं है।

    परिणामस्वरूप, न्यायालय ने कंसोर्टियम की अपील स्वीकार की। इस प्रकार, सिंगल जज का आदेश रद्द कर दिया गया। साथ ही अभ्यर्थी की संबंधित अपील भी खारिज की गई।

    Case title - Consortium of National Law Universities Through its Convenor vs Avneesh Gupta (Minor) 2026 LiveLaw (AB) 266

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