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मौत की सज़ा देने से पहले अपराधी में सुधार की संभावना की तलाश के लिए उसका मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सकीय आकलन होना चाहिए : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
1 Dec 2018 7:39 AM GMT
मौत की सज़ा देने से पहले अपराधी में सुधार की संभावना की तलाश के लिए उसका मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सकीय आकलन होना चाहिए : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मौत की सज़ा देने से पहले उस अपराधी का उचित मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सकीय आकलन होना चाहिए ताकि यह पता किया जा सके कि उसमें सुधार की संभावना है कि नहीं।

न्यायमूर्ति कुरीयन जोसफ़,न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने छन्नू लाल वर्मा बनाम छत्तीसगढ़ राज्य मामले में तीन लोगों की हत्या के आरोपी व्यक्ति की मौत की सज़ा को बदल दिया।

पीठ ने बच्चन सिंह मामलासहित विभिन्न फ़ैसलों का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में जो मौत की सज़ा दी गई है वह विरलों में भी विरल श्रेणी में नहीं आता। यह पाया गया है कि निचली अदालत ने सुनवाई केदौरान सज़ा सुनाने के लिए अलग से सुनवाई नहीं करके ग़लती की है।

बलात्कार के मामलों में आरोपी को के बरी होने की बात पर ग़ौर करते हुए पीठ ने कहा,“याचिकाकर्ता का कोई आपराधिक रेकर्ड नहीं रहा है…उसके ख़िलाफ़ झूठे आरोप लगाए गये थे…”

कोर्ट ने कहा कि मौत की सज़ा सुनाने के समय अपराधी में सुधार की गुंजाइश है कि नहीं इस बात का भी ख़याल रखा जाना चाहिए।पीठ ने कहा कि जेल में बंद रहने के दौरान क़ैदी के व्यवहार को नज़रंदाज़ नहीं कियाजा सकता और अगर क़ैदी ने क़ैद के दौरान अच्छा व्यवहार किया है तो यह इस बात का प्रमाण है कि उसमें सुधार की संभावना है। कोर्ट ने कहा,“एक क़ैदी को जेल भेजा जाता है इस उम्मीद के साथ कि वह अपनेव्यवहार में सुधार करेगा। मौत की सज़ा के साये में जी रहे व्यक्ति में सकारात्मक बदलाव पर, हमारे विचार से कोर्ट को ग़ौर करना चाहिए और कोई निर्णय लेने से पहले उसे यह सोचना चाहिए और कोई ऐसा वैकल्पिकफ़ैसले का चुनाव करना चाहिए जिस पर कोई ऊँगली ना उठा सके।”

पीठ ने अभियोजन को सुझाव दिया,“किसी अपराधी में सुधार की संभावनाओं की जहाँ तक बात है, हमने पाया है कि इस बारे में कोई मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सकीय आकलन किया जाता है। बिना इस तरह केआकलन के यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि सुधार की कोई संभावना नहीं है। यह बताते हुए कि आरोपी में सुधार या पुनर्वास की कोई संभावना नहीं है, राज्य को यह ख़याल रखना है।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मौत की सज़ा देने से पहले उस अपराधी का उचित मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सकीय आकलन होना चाहिए ताकि यह पता किया जा सके कि उसमें सुधार की संभावना है कि नहीं।

न्यायमूर्ति कुरीयन जोसफ़, दीपक गुप्ता और हेमंत गुप्ता की सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने छन्नू लाल वर्मा बनाम छत्तीसगढ़ राज्य मामले में तीन लोगों की हत्या के आरोपी व्यक्ति की मौत की सज़ा को बदल दिया।

पीठ ने बच्चन सिंह मामलासहित विभिन्न फ़ैसलों का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में जो मौत की सज़ा दी गई है वह विरलों में भी विरल श्रेणी में नहीं आता। यह पाया गया है कि निचली अदालत ने सुनवाई केदौरान सज़ा सुनाने के लिए अलग से सुनवाई नहीं करके ग़लती की है।

बलात्कार के मामलों में आरोपी को के बरी होने की बात पर ग़ौर करते हुए पीठ ने कहा,“याचिकाकर्ता का कोई आपराधिक रेकर्ड नहीं रहा है…उसके ख़िलाफ़ झूठे आरोप लगाए गये थे…”

कोर्ट ने कहा कि मौत की सज़ा सुनाने के समय अपराधी में सुधार की गुंजाइश है कि नहीं इस बात का भी ख़याल रखा जाना चाहिए।पीठ ने कहा कि जेल में बंद रहने के दौरान क़ैदी के व्यवहार को नज़रंदाज़ नहीं कियाजा सकता और अगर क़ैदी ने क़ैद के दौरान अच्छा व्यवहार किया है तो यह इस बात का प्रमाण है कि उसमें सुधार की संभावना है। कोर्ट ने कहा,“एक क़ैदी को जेल भेजा जाता है इस उम्मीद के साथ कि वह अपनेव्यवहार में सुधार करेगा। मौत की सज़ा के साये में जी रहे व्यक्ति में सकारात्मक बदलाव पर, हमारे विचार से कोर्ट को ग़ौर करना चाहिए और कोई निर्णय लेने से पहले उसे यह सोचना चाहिए और कोई ऐसा वैकल्पिकफ़ैसले का चुनाव करना चाहिए जिस पर कोई ऊँगली ना उठा सके।”

पीठ ने अभियोजन को सुझाव दिया,“किसी अपराधी में सुधार की संभावनाओं की जहाँ तक बात है, हमने पाया है कि इस बारे में कोई मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सकीय आकलन किया जाता है। बिना इस तरह केआकलन के यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि सुधार की कोई संभावना नहीं है। यह बताते हुए कि आरोपी में सुधार या पुनर्वास की कोई संभावना नहीं है, राज्य को यह ख़याल रखना है।”


 
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