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पित्त की थैली को निकालने के लिए लैप्रोस्कोपिक नहीं परंपरागत ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर को सुप्रीम कोर्ट की राहत [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
2 Oct 2018 1:53 PM GMT
पित्त की थैली को निकालने के लिए लैप्रोस्कोपिक नहीं परंपरागत ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर को सुप्रीम कोर्ट की राहत [निर्णय पढ़ें]
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सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक सर्जन के खिलाफ राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) के आदेश को निरस्त कर दिया। एनसीडीआरसी ने इस सर्जन को लापरवाह पाया और आरोप लगाया की पित्त की थैली को निकालने के लिए लैप्रोस्कोपिक की बजाय उसने परंपरागत ऑपरेशन किया और इसके बारे में मरीज ने कोई स्पष्ट इच्छा व्यक्त नहीं की थी।

मरीज ने उपभोक्ता अदालत में शिकायत की थी कि उसकी इच्छा के बिना उस पर यह ऑपरेशन किया गया जबकि उसने सिर्फ लैप्रोस्कोपिक सर्जरी की अनुमति दी थी। उसने शिकायत की थी कि परंपरागत सर्जरी की वजह से उसके घाव पर कई टांके लगाए गए और इस वजह से निशान पड़ गए।

उपभोक्ता मंच पर सर्जन ने कहा कि लैप्रोस्कोपिक सर्जरी शुरू करने के बाद उसने पाया कि वहाँ उसकी पित्त की थैली में सूजन है और ऑपरेशन रूम से बाहर आकार यह बात उसने उसके पति को बताया कि इस स्थिति में उसका लैप्रोस्कोपिक सर्जरी नहीं हो सकता और सिर्फ परंपरागत सर्जरी ही हो सकती है। सर्जन ने कहा कि सर्जरी मरीज के पति की अनुमति से ही की गई।

यद्यपि राज्य उपभोक्ता मंच ने इस शिकायत को खारिज कर दिया था, पर राष्ट्रिय आयोग ने सर्जन को दो लाख रुपए हर्जाना देने का आदेश दिया। इसके बाद सर्जन ने सुप्रीम कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एएम सप्रे और विनीत सरन की पीठ ने इस मामले (एसके झुनझुनवाला बनाम धनवंती कुमार) मरीज द्वारा हस्ताक्षरित अनुमति पत्र पर गौर किया और कहा कि डॉक्टर को इस तरह का वैकल्पिक ऑपरेशन करने का अधिकार है।

“हमारे विचार में, परंपरागत ऑपरेशन करने के लिए दूसरी बार अनुमति लेने की जरूरत नहीं थी क्योंकि जो दूसरी तरह का ऑपरेशन किया गया वह भी उसी अंग से संबंधित था...और जिस दूसरे ऑपरेशन का सुझाव दिया गया वह भी इस अंग को निकालने के लिए किया जाने वाला सर्वविदित ऑपरेशन है,” पीठ ने कहा।

कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि मरीज के पति ने परंपरागत ऑपरेशन करने की अनुमति दी थी। कोर्ट ने कहा,“अपीलकर्ता ने अपने साक्ष्य में जिन तथ्यों का उल्लेख किया है उस पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है। हमारी राय में यह एक स्वाभाविक व्यवहार है और ऑपरेशन करने वाला कोई भी विवेकशील डॉक्टर मरीज के रिश्तेदारों को सूचना देने के बाद ऑपरेशन को पूरा करेगा”।

आयोग ने अपना फैसला सुनाने के लिए समीरा कोहली बनाम डॉ. प्रभा मंचन्द मामले में आए फैसले पर भरोसा किया और यह माना की परंपरागत ऑपरेशन के लिए सहमति नहीं दी गई थी।

पर पीठ ने इसी फैसले में “अपवाद” का जिक्र किया जिसमें कहा गया है, “इस नियम का एक ही अपवाद है कि जहां अतिरिक्त प्रक्रिया यद्यपि यह अनधिकृत है, मरीज की जिंदगी या स्वास्थ्य बचाने के लिए आवश्यक है, तो इस तरह के अनधिकृत प्रक्रिया में देरी करना तब तक के लिए असंगत है जब तक कि मरीज होश में नहीं आ जाता”।

पीठ ने राष्ट्रिय उपभोक्ता आयोग के आदेश को खारिज कर दिया और कहा कि यह स्पष्टतः सर्जन को ऑपरेशन की सहमति देने का मामला है और उसने जो ऑपरेशन किया वह अनधिकृत नहीं था और मूल सहमति के आधार पर ही वह इस तरह का अतिरिक्त ऑपरेशन करने का अधिकार रखता है और उसके पति द्वारा दी गई सहमति के आधार पर भी।

 

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