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J&K को विशेष दर्जा देने वाले प्रावधान अनुच्छेद 35A की संवैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जनवरी तक टली

LiveLaw News Network
31 Aug 2018 9:07 AM GMT
J&K को विशेष दर्जा देने वाले प्रावधान अनुच्छेद 35A की संवैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जनवरी तक टली
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जम्मू एवं कश्मीर राज्य को मिले विशेष दर्ज को लेकर यानी अनुच्छेद 35 A की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली कई जनहित याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जनवरी 2019 के दूसरे हफ्ते तक चल गई है।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चन्द्रचूड़  की पीठ ने  हाई वोल्टेज सुनवाई के बाद ये सुनवाई टाल दी। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि पहले बेंच को ये सुनवाई करनी है कि क्या अनुच्छेद 35 A संविधान के खिलाफ है या नहीं और इसे संविधान पीठ में भेजा जाए या नहीं।

वहीं जम्मू- कश्मीर की ओर से पेश ASG तुषार मेहता ने कहा कि राज्य में पंचायत और स्थानीय निकाय के चुनाव होने हैं इसलिए सुनवाई को टाल दिया जाए। राज्य में हालात खराब हैं और वहां पर पैरा मिलिट्री फोर्स लगाए गए हैं।

जब याचिकाकर्ता चारू वली खन्ना की ओर से कहा गया कि महिलाओं के साथ भेदभाव होता है तो तुषार ने कहा कि हम मानते हैं कि इसमें महिलाओं से भेदभाव का एक तथ्य है। लेकिन इस पर बहस होनी चाहिए।

जस्टिस खानविलकर ने कहा कि जब राज्य सरकार कह रही है कि कानून व्यवस्था नियंत्रण से बाहर हो रही है तो कोर्ट ऐसे में मामले की सुनवाई कैसे कर सकता है।

याचिकाकर्ता वी द सिटीजन की ओर से जल्द  की मांग करने पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि राष्ट्रपति का आदेश 1954 का है। 56 साल बाद इसे चुनौती दी गई। इसलिए सुनवाई जल्द करने की जरूरत नहीं है।

गौरतलब है कि 1 मई को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकार को एक अन्य जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया था जिसमें संविधान के अनुच्छेद 35 ए को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई जो जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा देता है और स्थायी बसने वालों की पीढ़ियों के अधिकारों को अस्वीकार करता है।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चन्द्रचूडकी पीठ ने नोटिस जारी करने के बाद पीआईएल को लंबित याचिकाओं के साथ सुनवाई के लिए टैग किया था। पीआईएल में दलील दी गई है कि राष्ट्रपति 1954 के आदेश से संविधान में संशोधन नहीं कर सकते और इसे अस्थायी प्रावधान माना जाता है। अनुच्छेद 35 ए राज्य के मूल निवासियों के अलावा सभी भारतीयों को जम्मू-कश्मीर में कहीं भी अचल संपत्ति प्राप्त करने, जम्मू-कश्मीर सरकार के तहत नौकरियां प्राप्त करने, राज्य में बसने और राज्य प्रायोजित छात्रवृत्ति योजनाओं का लाभ उठाने से रोकता है।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 35 ए और अनुच्छेद 370 के अनुपालन में जम्मू-कश्मीर सरकार, जो राज्य को विशेष स्वायत्त स्थिति प्रदान करती है, गैर-निवासियों के खिलाफ भेदभाव कर रही है, वो संपत्ति खरीदने से वंचित हैं, स्थानीय नौकरी पाने या स्थानीय चुनाव में मतदान नहीं कर सकते। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि अनुच्छेद 35 ए संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार को दूर करने के कारणों के बिना इस वर्गीकरण को प्रतिरक्षा प्रदान करता है।

यह प्रस्तुत किया गया कि दूसरी, तीसरी और चौथी पीढ़ी के 4000 से अधिक लोग पंजाब राज्य के गुरदासपुर और अमृतसर से जम्मू-कश्मीर राज्य के जम्मू क्षेत्र में बसने के लिए चले गए थे, ताकि वो सफाईकर्मी के रूप में काम कर सकें। याचिकाकर्ता जम्मू-कश्मीर राज्य में पैदा हुए थे और उनके जन्म के बाद से  वे स्थायी रूप से राज्य में रह रहे हैं ।

राज्य वित्त पोषित उच्च तकनीकी शैक्षिक संस्थानों में प्रवेश लेने का अधिकार अस्वीकार, छात्रों को राज्य छात्रवृत्ति और राज्य सहायता प्राप्त करने का अधिकार अस्वीकार, राज्य सेवाओं और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में रोजगार के अवसर से इनकार करना और राज्य सरकार के तहत स्थानीय निकाय, आश्रय और निपटारे के उद्देश्य के लिए संपत्ति हासिल करने के अधिकार से वंचित करना उनके मौलिक अधिकारों को प्रभावित कर रहा है।

इसलिए अनुच्छेद 35 ए को असंवैधानिक घोषित करने के लिए वर्तमान याचिका दाखिल की गई है।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में जम्मू एवं कश्मीर राज्य को मिले विशेष दर्ज को लेकर यानी अनुच्छेद 35 A की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली पूर्व सैनिक सहित तीन लोगों की ओर से दायर इस याचिका को सुप्रीम कोर्ट  ने केंद्र को नोटिस जारी कर पहले दायर इसी तरह की याचिकाओं के साथ जोड़ दिया था।

याचिका में भारतीय संविधान के अनुच्छेद-35ए और जम्मू एवं कश्मीर संविधान केखंड-छह को असंवैधानिक करार देने की गुहार की गई है। याचिका में कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद -35 A और जम्मू एवं कश्मीर संविधान के खंड-छह विभाजन के बाद पश्चिम पाकिस्तान से कश्मीर में आए लोगों के साथ भेदभावपूर्ण है। उनका कहना है कि वे तीसरी पीढ़ी के लोग हैं लेकिन अब तक उन्हें जम्मू एवं कश्मीर के वांशिदें को मिलने वाला लाभ नहीं मिल रहा है।  एेसे करीब तीन लाख लोग आज भी कश्मीर में तीन पीढियां बीतने के बावजूद शरणार्थी बने हुए हैं।

इससे पहले कोर्ट ने कहा था कि इस मामले की सुनवाई संवैधानिक बेंच द्वारा की जानी चाहिए। यदि यह अनुच्छेद संविधान के अधिकार क्षेत्र से बाहर है या इसमें कोई प्रक्रियागत खामी है। कोर्ट ने कहा था कि तीन जजों की बेंच मामले की सुनवाई करेगी और फिर इसे पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेजेगी।

सुप्रीम कोर्ट में वकील चारू वली खन्ना की ओर से भी संविधान के अनुच्छेद 35ए और जम्मू-कश्मीर के संविधान के प्रावधान छह को चुनौती देने वाली याचिका दाखिल की गई है। याचिका में कुछ विशेष प्रावधानों को चुनौती दी गयी है- राज्य के बाहर के किसी व्यक्ति से विवाह करने वाली महिला को संपत्ति का अधिकार नहीं मिलना। इस प्रावधान के तहत राज्य के बाहर के किसी व्यक्ति से विवाह करने वाली महिला का संपत्ति पर अधिकार समाप्त हो जाता है और उसके बेटे को भी संपत्ति का अधिकार नहीं मिलता।

सबसे पहले वी द सिटीजन नामक संगठन ने 2014 में ये याचिका दाखिल की थी।  संविधान में 1954 में राष्ट्रपति के आदेश से जोड़ा गया अनुच्छेद 35ए जम्मू-कश्मीर के स्थाई निवासियों को विशेषाधिकार और सुविधाएं देता है। ।

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