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जज के फेसबुक पोस्ट पर वकील की टिप्पणी से केस ट्रांसफर हुआ, बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुहर लगाई [आर्डर पढ़े]

LiveLaw News Network
20 July 2018 5:23 AM GMT
जज के फेसबुक पोस्ट पर वकील की टिप्पणी से केस ट्रांसफर हुआ, बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुहर लगाई [आर्डर पढ़े]
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 बॉम्बे हाईकोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने हाल ही में  वकील द्वारा जज के फेसबुक पोस्ट पर टिप्पणी के बाद निचली अदालत के जज से मामले को ट्रांसफर  करने के फैसले को बरकरार रखा।

 न्यायमूर्ति शांतनु केमकर और न्यायमूर्ति नितिन डब्लू सांब्रे ने कहा कि न्यायाधीश के पोस्ट पल टिप्पणी करने का वकील का कार्य "पेशेवर दुर्व्यवहार" के रूप में देखा जाना चाहिए, “ फेसबुक पोस्ट के जवाब में याचिकाकर्ता संख्या 4 का आचरण एक न्यायाधीश जो उपरोक्त पृष्ठभूमि में उनकी अपील पर सुनवाई कर रहा था, इसे विस्तार से जांचने पर पेशेवर दुर्व्यवहार के रूप में देखा जा सकता है।”

अदालत के समक्ष मामला पुणे सत्र न्यायालय में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश एसबी बहालकर द्वारा सुने जा रहे दो परिवारों के बीच एक संपत्ति विवाद से संबंधित है।

सवाल में वकील सोनिया आत्माराम प्रभु, जो याचिकाकर्ताओं में से एक थी और अदालत के समक्ष अपने परिवार का प्रतिनिधित्व कर रहे थी, ने न्यायाधीश के एक फेसबुक पोस्ट पर उनके मामले की सुनवाई पर टिप्पणी की।

 घटना पर कार्रवाई करते हुए न्यायाधीश बहालकर ने प्रमुख जिला न्यायाधीश एसएम मोडक को सूचित किया और उन्होंने  इस मामले के ट्रांसफर करने  का आदेश दिया था।

याचिकाकर्ताओं ने फिर उच्च न्यायालय से संपर्क किया था और जजों के खिलाफ "अपीलकर्ताओं के अधिकारों का उल्लंघन करने के लिए अपनी शक्तियों का दुरुपयोग" करने के लिए दोनों के खिलाफ "उचित कार्रवाई" की मांग की थी।

 याचिकाकर्ताओं ने अदालत से दिशानिर्देश मांगा था कि क्या कोई न्यायाधीश इस आधार पर किसी विशेष मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर सकता है कि किसी भी लंबित मामले में वकील या पक्षकार किसी सोशल मीडिया के मंच पर उनके एकाउंट में पोस्ट किया है।

इससे पहले मामले के तथ्यों की जांच करते हुए अदालत ने कहा कि न्यायमूर्ति बहालकर से इस मामले के ट्रांसफर करने का आदेश "उचित" था।

कोर्ट ने आगे कहा कि एक मुकदमा सुनना न्यायाधीश का  "अपने निजी डोमेन के भीतर एक मुद्दा" है, "एक न्यायाधीश खुद को मुकदमेबाजी के विषय में अपने व्यक्तिगत या निजी हित के आधार पर पार्टी / पक्षकारों के साथ उनकी आत्मीयता को देखते हुए खुद के विवेक के आधार पर ये फैसला कर सकता है कि वो मामले को सुन सकते हैं या इसमें हितों का टकराव है तो वो सुनवाई से अलग हो सकते हैं।

इस तरह के फैसले पूरी तरह से मामले से निपटने वाले न्यायाधीश के अधिकारक्षेत्र में हैं।”

न्यायालय ने उस परिदृश्य की गंभीरता को भी उजागर किया जहां एक पक्षकार जज को खुद सुनवाई से अलग करने के लिए कहता, "किसी न्यायाधीश को मुकदमे से खुद को अलग करने के लिए कहना  बहुत गंभीरता से देखा जाना चाहिए जब तक कि इस तरह के अनुरोध से जज के संज्ञान में कुछ मुद्दों को लाया नहीं जाता  जैसे व्यक्तिगत या निजी हित, पार्टी / पार्टियों के साथ अंतरंगता आदि के मुद्दों पर जो उसे इस तरह के मामले को लेने से अयोग्य घोषित करता है। "


 
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