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किसी प्रत्यक्षदर्शी की गवाही पर सिर्फ इसलिए संदेह नहीं किया जा सकता कि उसने मृतक को बचाने की कोई कोशिश नहीं की : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
12 July 2018 5:25 AM GMT
किसी प्रत्यक्षदर्शी की गवाही पर सिर्फ इसलिए संदेह नहीं किया जा सकता कि उसने मृतक को बचाने की कोई कोशिश नहीं की : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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किसी अपराध को देखकर हर व्यक्ति में अलग-अलग तरह की प्रतिक्रया होती है और उनकी गवाही पर सिर्फ इसलिए कोई संदेह नहीं किया जाना चाहिए कि गवाह ने एक ख़ास तरीके की प्रतिक्रया नहीं दी।”

सुप्रीम कोर्ट ने मोतीराम पडू जोशी बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में हत्या के अभियुक्त को मिली सजा को सही ठहराते हुए कहा कि प्रत्यक्षदर्शियों पर इसलिए कोई संदेह नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने झगड़े में दखल नहीं दिया और मृतक को बचाने की कोशिश नहीं की।

इस मामले में हाईकोर्ट ने अभियुक्त को बरी करने के निचली अदालत के निर्णय को उलट दिया था। निचली अदालत ने इस दलील को उचित माना कि प्रत्यक्षदर्शियों ने मृतक को बचाने की कोशिश नहीं की और उसको यह अविश्वसनीय लगा कि आरोपियों को हथियार से लैस देखने के बावजूद दोनों घर के अंदर चले गए। हाईकोर्ट ने कहा कि उनकी गवाही विश्वसनीय नहीं है लेकिन हाईकोर्ट के लिए इस तरह का हस्तक्षेप करना और प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही के आधार पर अपनी राय बनाना उचित नहीं है।

न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति आर बनुमती की पीठ ने हाईकोर्ट की इस बात से सहमति जताई कि निचली अदालत ने फालतू की बातों जैसे, “जाँघों और टांगों पर कीचड़ लगे होने” और प्रत्यक्षदर्शियों के व्यवहार जैसी बातों को तरजीह दिया कि उन लोगों ने एक विशेष तरह से प्रतिक्रया क्यों नहीं दिखाई।

पीठ ने कहा, “उनकी गवाही पर इस आधार पर संदेह नहीं किया जा सकता कि उन्होंने झगड़े में दखल क्यों नहीं दिया न ही यह कहा जा सकता कि उन्होंने मृतक को बचाने की कोशिश नहीं की। किसी अपराध को देखकर हर व्यक्ति में अलग-अलग तरह की प्रतिक्रया होती है और उनकी गवाही पर सिर्फ इसलिए कोई संदेह नहीं किया जाना चाहिए कि गवाह ने एक ख़ास तरीके की प्रतिक्रया नहीं दी। पीडब्ल्यू-3 और 4 ने जो गवाही दी है उस पर सिर्फ इस वजह से संदेह नहीं किया जा सकता क्योंकि उन्होंने एक खास तरीके से प्रतिक्रया नहीं दी।”

राणा प्रताप बनाम हरियाणा राज्य मामले में आए फैसले का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा, “गवाही के साक्ष्य की प्रशंसा करते हुए, हमें यह देखना चाहिए कि गवाहों के बयान सच हैं कि नहीं और अभियोजन पक्ष द्वारा जुटाए गए साक्ष्यों के अनुसार हैं कि नहीं। उनकी गवाही पर सिर्फ इसलिए संदेह नहीं किया जा सकता क्योंकि वे विपक्षी धरे के हैं। कुल मिलाकर उनकी गवाही की बहुत सावधानीपूर्वक जांच किए जाने की जरूरत है।”

पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया और हर अभियुक्त को मिली उम्र कैद की सजा को सही ठहराया।


 
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