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क्राइम सीन से प्राप्त नमूने से ब्लड ग्रुप का निर्धारण ना करना अभियुक्त को बरी करने के लिए पर्याप्त नहीं : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
5 July 2018 4:50 PM GMT
क्राइम सीन से प्राप्त नमूने से ब्लड ग्रुप का निर्धारण ना करना अभियुक्त को बरी करने के लिए पर्याप्त नहीं : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को जोर देकर कहा कि सिर्फ क्राइम सीन से प्राप्त नमूने से ब्लड ग्रुप का मिलान ना कराना  ही अभियुक्त को बरी करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।

 न्यायमूर्ति एल  नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति मोहन एम शांतनागौदर की पीठ ने राजस्थान राज्य बनाम तेजा राम के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित फैसले पर भरोसा किया जिसमें यह माना गया था कि खून की उत्पत्ति का निर्धारण नहीं करना अभियोजन पक्ष के मामले में घातक साबित नहीं होता।

 अदालत प्रभु दयाल द्वारा दायर अपील की सुनवाई कर रही थी जिन्होंने सितंबर, 2013 में राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा पारित एक फैसले को चुनौती दी थी। इसमें चार अन्य लोगों के साथ गोपाल की हत्या के लिए दोषी ठहराए जाने को बरकरार रखा गया था।

 दयाल एकमात्र ऐसा व्यक्ति था जिसने गवाहों के साक्ष्य में विसंगतियों को इंगित करते हुए अपनी दोष सिद्धि को चुनौती दी थी। उन्होंने क्राइम सीन से खून के धब्बों की सामग्री की अनुपस्थिति पर भरोसा किया था। हालांकि अदालत ने कहा कि दयाल को सिर्फ इसलिए नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि ब्लड ग्रुप को क्राइम सीन से एकत्र किए गए नमूनों से निर्धारित नहीं किया जा गया है, " हमने फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी के साथ-साथ बैलिस्टिक विशेषज्ञों की रिपोर्टों को भी देखा है। फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी रिपोर्ट से पता चलता है कि अपराध के दृश्य से एकत्र किए गए नमूने में इंसान का खून था।  हालांकि चूंकि खून के सैंपल फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी द्वारा खून की जांच के दौरान विघटित हो गए इसलिए ब्लड ग्रुप को निर्धारित नहीं किया जा सका।

इसके लिए अभियुक्त को निर्दोष नहीं कहा जा सकता विशेष रूप से जब खून के धब्बे इंसानी मूल के पाए गए थे। "  यह आगे ध्यान दिया गया कि फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की रिपोर्ट ने अभियोजन पक्ष के मामले का भी समर्थन किया और यह निष्कर्ष निकाला कि दयाल ने पीड़ित की हत्या के लिए एकत्रित गैरकानूनी जमावड़े में हिस्सा लिया था। इसलिए अदालत ने अपील को खारिज कर दिया और दयाल को दी गई आजीवन कारावास की सजा की पुष्टि की।


 
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