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राज्य और सहायक सरकारी वकील के बीच संबंध वकील और उसके मुवक्किल जैसा है न कि मालिक और नौकर का : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
5 July 2018 10:31 AM GMT
राज्य और सहायक सरकारी वकील के बीच संबंध वकील और उसके मुवक्किल जैसा है न कि मालिक और नौकर का : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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राज्य चुनाव आयुक्त, बिहार, पटना बनाम जनकधारी प्रसाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि किसी एडवोकेट को सहायक सरकारी वकील के रूप में नियुक्ति एक पेशेवर करार है और दोनों के बीच संबंध एक वकील और उसके मुवक्किल जैसा है न कि मालिक और नौकर का।

पंचायत सदस्य जनकधारी प्रसाद को राज्य चुनाव आयोग ने इसलिए योग्य घोषित कर दिया क्योंकि वह राज्य सरकार के अधीन सहायक वकील के रूप में नियुक्ति थे और जिन मामलों में वे सरकार की पैरवी करते हैं उसके लिए उनको पैसे मिलते हैं और इसलिए ऐसा मान जाएगा कि वे राज्य सरकार की सेवा में हैं।

पटना हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग के फैसले को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले के पक्ष में दिए गए दलील में कहा,




  • सहायक सरकारी वकील की नियुक्ति सरकार की मदद के लिए हुई है और सरकार को दी जाने वाली इस सेवा के बदले उसको पैसे दिए जाते हैं पर उसको कोई आश्रितों का फीस नहीं दिया जाता।

  • सहायक सरकारी वकील एक एडवोकेट है जो बार काउंसिल के रोल पर है और अपने मुवक्किलों को सलाह देने के अलावा सरकार अदालत में सरकार की पैरवी भी करता है।

  • सरकारी वकील की नियुक्ति एक निश्चित समय के लिए कार्यपालक आदेश के द्वारा होता है और वह एक क़ानूनी पेशेवर बना रहता है।

  • सरकार द्वारा वकील नियुक्त किये जाने के लिए न तो न्यूनतम या अधिकतम आयु सीमा निर्धारित है और न ही इसके रिटायरमेंट की उम्र निर्धारित है।

  • सहायक सरकारी वकील को उसकी सेवा के लिए फीस दी जाती है और उसके लिए कोई विशेष वेतनमान निर्धारित नहीं है।

  • वह उसी आचरण संहिता से निर्देशित होता है जिससे कोई अन्य वकीलहोता है।


मालिक और नौकर का संबंध नहीं

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने कनक चंद्र दत्ता के मामले में संविधान पीठ के फैसले को उद्धृत करते  हुए कहा,“राज्य सरकार और उसके अधीन किसी पद पर मौजूद व्यक्ति के बीच मालिक और नौकर का रिश्ता होता है। इस तरह का संबंध तब होता है जब राज्य किसी व्यक्ति को किसी पद पर चुनाव के बाद उसकी नियुक्ति करता है, और उसको निलंबित करने और हटाने का उसको अधिकार होता है, उसके काम करने के तरीकों को और उसको मिलने वाले पारिश्रमिक या वेतन को वह नियंत्रित करता है। इन सभी बातों या इनमें से कुछ बातों की मौजूदगी और अन्य परिस्थितियों की वजह से मालिक और नौकर का यह रिश्ता होता है...”

पीठ ने इस बारे में कुमारी श्रीलेखा विद्यार्थी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले का भी जिक्र किया और कहा कि उक्त मामले में उसने सरकारी वकील के पद से सार्वजनिकता का तत्त्व जुड़ा है और यह नहीं कहा है कि ये सरकारी सेवाओं के अधीन होते हैं।

कोर्ट ने कहा, “...मालिक और नौकर के रिश्ते को स्थापित करने वाली बात इसमें नहीं है। इसलिए उसके बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि वह राज्य सरकार की सेवा में है”। ऐसा कहते हुए पीठ ने अपील खारिज कर दी।”


 
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