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1975 आपातकाल की बरसी : फली एस नरीमन ने कहा, हमें तानाशाही सत्ता किसी एक व्यक्ति को नहीं सौंपनी चाहिए

LiveLaw News Network
29 Jun 2018 5:23 AM GMT
1975 आपातकाल की बरसी : फली एस नरीमन ने कहा, हमें तानाशाही सत्ता किसी एक व्यक्ति को नहीं सौंपनी चाहिए
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भारतीयों को 26 जून को हमेशा ही याद रखना चाहिए और खुद से सवाल करना चाहिए हमने इसके साथ क्या किया”, नरीमन ने कहा।

वर्ष 1975 लगाए गए आपातकाल को याद करते हुए वरिष्ठ वकील और संविधान विशेषज्ञ फली एस नरीमन ने मंगलवार को कहा कि वैसे दुनिया आज जानती है कि तत्काल प्रधानमन्त्री इंदिरा गाँधी ने उस समय क्या किया और न्यायपालिका कैसे अपना कर्तव्य भूल गई पर सबसे बड़ी बात यह है कि इसको लेकर क्या किया गया है।

वे भारत में 1975 में आपातकाल लगाये जाने की 42वीं बरसी पर इंडिया हैबिटैट सेंटर में “द इमरजेंसी : देन एंड नाऊ” विषय पर आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे। इस समारोह में अजोय बोस और जॉन दयाल की पुस्तक “फॉर रीजन्स ऑफ़ स्टेट देलही अंडर इमरजेंसी” नामक पुस्तक को दुबारा जारी किया गया जिसकी भूमिका बीबीसी के पत्रकार रह चुके मार्क टुली ने लिखी है।

 नरीमन ने कहा हमें 26 जून को उसी तरह हमेशा याद रखना चाहिए जैसे इंग्लैंड गाय फाव्क्स डे को याद रखता है।

“सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हमने इसके बारे में क्या किया है? सांसदों ने अध्यक्ष और प्रधान मंत्री  को बधाई दी कि अब वे बिना किसी विरोध के कोई भी विधेयक पास कर सकते हैं...चंद्रशेखर का स्वर एकमात्र विरोधी स्वर था...हमें इसके बारे में बात करना चाहिए और लोगों की इस बारे में प्रतिक्रया जाननी चाहिए...कल ही प्रधान मंत्री द्वारा राष्ट्रपति को आपातकाल घोषित करने के मंत्रिमंडल के पूर्व के आदेश के बारे में भेजे गए पत्र पर एक वृत्त चित्र दिखाया गया....यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण है...कुछ लोगों ने कहा है कि राष्ट्रपति ने इस पर हस्ताक्षर करने के बाद नींद की गोली लेकर सो गए...मैं कहता हूँ कि क्या उन्होंने ऐसा पहले किया था (हंसते हैं)...जब उनसे पूछा गया कि इस घोषणा के बारे में उनका क्या कहना है, बाबू जगजीवन राम जो कि इंदिरा गाँधी के मंत्रिमंडल के सदस्य थे, ने कहा था, “मैडम, अब जब आपने आपातकाल लगा ही दिया है तो इसके बारे में क्या कहा जा सकता है...”

जजों की भूमिका के बारे में नरीमन ने कहा, “जज हमारी अपेक्षाओं पर नहीं उतरे...सुप्रीम कोर्ट हमारी अपेक्षाओं पर नहीं उतरा...ये सब अनकही बाते हैं...एडीएम जबलपुर (1976) में, चार वरिष्ठतम जजों ने हमें नीचा दिखाया...न्यायमूर्ति एचआर खन्ना को अपनी बहादुरी भरे विरोध के कारण मुख्य न्यायाधीश नहीं बनाया गया...”

“अवकाशकालीन जज न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर का आदेश है (इंदिरा गाँधी बनाम राज नारायण, 1975) जिसमें उन्होंने पांचवीं लोकसभा में श्रीमती गाँधी के चुनाव को रद्द करने के बारे में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर सशर्त स्थगन दिया था...मैं अमूमन उनको मजाक में कहता था कि वास्तव में आपातकाल के लिए वही जिम्मेदार थे न कि श्रीमती गाँधी...(नानी) पालकीवाला (श्रीमती गांधी की पैरवी करने वाले वकील) ने उनको धमकी दी थी कि अगर उनको इस आदेश पर पूर्ण स्थगन नहीं दिया गया तो देश में विद्रोह हो जाएगा...” उन्होंने हँसते हुए कहा।

उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के जज के रूप में न्यायमूर्ति एस रंगराजन की इसलिए प्रशंसा कि क्योंकी उन्होंने पत्रकार कुलदीप नैयर की निरोधात्मक हिरासत को रद्द कर दिया था – “न्यायमूर्ति रंगराजन को असम स्थानांतरित कर दिया गया...उन्होंने दूसरे लोगों की तरह पद नहीं छोड़ा और एक अच्छे सिपाही की तरह जहां भेजा गया वहाँ चले गए...अतिरिक्त जज न्यायमूर्ति (आरएन) अग्रवाल (उस खंडपीठ के सदस्य थे जिसमें न्यायमूर्ति रंगराजन भी थे) को वापस जिला जज बना दिया गया...”

 “एक बहादुर और स्वतंत्र जज थे, न्यायमूर्ति टीपीएस चावला (दिल्ली हाईकोर्ट) जिन्होंने एक त्यागपत्र लिखा था और सभी जजों को उस पर हस्ताक्षर करने को कहा था...’ अगर 20 जज इसको भेजते हैं तो सरकार इस पर गौर करेगी’, उन्होंने कहा...हालांकि, इस पर केवल दो जजों ने ही हस्ताक्षर किया..., नरीमन ने कहा, और उस दूसरे पूर्व जज की भी प्रशंसा की।

“कभी भी किसी एक व्यक्ति को तानाशाही सत्ता नहीं सौंपनी चाहिए”, नरीमन ने कहा।

अभी हाल तक भाजपा में रहे और पूर्व मंत्री यशवंत सिन्हा ने प्रधान मंत्री मोदी की ‘मित्रों’ संबोधन का प्रयोग करते हुए कहा,“अब जागने का समय आ गया है और अगर हम ऐसा नहीं कर पाते हैं तो हमारी स्थिति बदतर हो जाएगी”।

 उन्होंने कहा, “1975 में जो खतरे थे, उससे कहीं ज्यादा खतरा अभी है। सिर्फ इसलिए कि लोग जेल नहीं गए हैं और मीडिया पर प्रतिबन्ध नहीं है इसलिए खतरे को नजरअंदाज करना गलत होगा।”

“1975 और अभी के अघोषित आपातकाल में अंतर यह है कि पहले जो हुआ वह सिर्फ एक राजनीतिक मामला था जबकि अभी जो हो रहा है वह भयंकर रूप से साम्प्रदायिक है...लोग धार्मिक घृणा फैलाकर चुनाव जीत सकते हैं...”, उन्होंने कहा।

उन्होंने भीड़ द्वारा लोगों को मार दिए जाने की घटनाओं का उल्लेख किया और हाल ही में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को “इस्लामी गुर्दा वाली” बताकर ट्रोल करने की घटना का जिक्र किया क्योंकि उन्होंने एक मुस्लिम व्यक्ति और उसकी दम्पति को पासपोर्ट बनवाने में मदद की।

सिन्हा ने कहा कि 44वें संविधान संशोधन के बाद अब संविधान के तहत आपातकाल लगाना मुश्किल हो गया है...लेकिन इसका भय आज भी बना हुआ है...लोकतंत्र की संस्थाओं को पूरी तरह नीचा दिखाया जा रहा है हर कोई अपनी आवाज उठाने से डर रहा है...

“संसद के पिछले सत्र में सरकार के खिलाफ अनेक पार्टियों ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया और उसके बाद हर दिन सदन की कार्यवाही स्थगित की जाती रही...सरकार विपक्ष को अपने अधिकारों का प्रयोग करने से रोक रही है...”

उन्होंने इस वर्ष जनवरी में सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों के प्रेस कांफ्रेंस का भी जिक्र किया और कहा कि इन जजों ने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट में बेंच फिक्सिंग हो रही है पर देश अभी भी नींद में है और हम यह कह रहे हैं कि देश में सब कुछ ठीक है...”

सिन्हा ने कहा कि चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा भी कम की जा रही है और 2016 की नोटबंदी में यही हाल आरबीआई का किया गया।

“...क्या कोई जांच एजेंसी अहमदाबाद के सहकारी बैंक में हुए घोटाले और पांच दिन में लगभग 750 करोड़ रुपए कैसे जमा किए गए इसकी जांच कर सकता है,” उन्होंने पूछा? उन्होंने कहा - नहीं।

“जिला अदालतों ने बहुत ही अजीबोगरीब फैसला दिया...द वायर ने एक खबर छापी जो कि किसी के बेटे (भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह) के बारे में थी..., प्रेस की स्वतंत्रता के बारे में उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा, “कोई सेंसरशिप नहीं है...मीडिया पूरी तरह स्वतंत्र है...”। उन्होंने कहा, “वह आज की सरकार की प्रशस्ति-गीत गाने के लिए स्वतंत्र है...”

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