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संपादकीय

लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले पार्टनर्स को बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के माध्यम से अलग नहीं कर सकते; केरल हाईकोर्ट ने 18 साल के लड़के और 19 साल की लड़की को एक साथ रहने की अनुमति दी [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
2 Jun 2018 1:10 PM GMT
लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले पार्टनर्स को बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के माध्यम से अलग नहीं कर सकते; केरल हाईकोर्ट ने 18 साल के लड़के और 19 साल की लड़की को एक साथ रहने की अनुमति दी [निर्णय पढ़ें]
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केरल हाईकोर्ट ने शुक्रवार को 18 साल के एक लड़के और 19 साल की एक लड़की को एक साथ रहने की इजाजत दे दी और इस बारे में लड़की के पिता द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज कर दिया।

न्यायमूर्ति वी चितम्बरेश और न्यायमूर्ति केपी ज्योतिन्द्रनाथ की पीठ ने कहा कि  कोर्ट बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका द्वारा एक साथ रह रहे दो लोगों (लिव -इन पार्टनर्स) को अलग नहीं कर सकता बशर्ते की दोनों ही वयस्क हो गए हों।

कोर्ट ने कहा, “हम इस तथ्य को नजरअंदाज  नहीं कर सकते कि लिव-इन रिलेशनशिप का हमारे समाज में चलन हो गया है और इस तरह साथ  रहने वाले पार्टनर्स को बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका द्वारा अलग नहीं कर सकते बशर्ते कि वे वयस्क हों।

इसके बावजूद कि  रूढ़िवादी समाज को शादी के बिना दो वयस्कों का एक साथ रहना पसंद नहीं है, संवैधानिक अदालत को इनके मौलिक अधिकार का आदर करना पड़ेगा।  इसलिए हम इस याचिका को ख़ारिज करने के लिए बाध्य हैं और वह अपने पार्टनर के साथ रहने और वैवाहिक उम्र को प्राप्त करने के बाद प्रतिवादी के साथ शादी कर सकती है।  ”

लड़की के पिता ने कोर्ट में यह कहते हुए याचिका दायर की थी कि उसे लड़के ने गैर कानूनी ढंग से बंद कर रखा है। पर लड़का और लड़की दोनों कोर्ट के समक्ष पेश हुए और कहा की वे अपने मन से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं।

कोर्ट ने मामले पर गौर करते हुए कहा कि अदालत ने बहु प्रचारित हादिया  मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त करते हुए कहा कि  हाईकोर्ट ने उनकी शादी को गैर कानूनी बताकर अपने न्यायिक क्षेत्राधिकार का उल्लंघन किया।

इसलिए अपने फैसले में कोर्ट ने कहा, “बंदी वयस्क है और उसको उस लड़के के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में अपने मन से रह रही है और उसे ऐसा करने का पूरा अधिकार है…बंदी को शादी के बिना भी  चौथे प्रतिवादी के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का पूरा अधिकार है क्योंकि क़ानून ने भी इसको मान्यता दे दी है।”


 
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