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पूर्व मुख्यमंत्रियों को विशेष वर्ग का नागरिक मानना मनमाना और भेदभावपूर्ण है : पढ़िए लोक प्रहरी की याचिका पर अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
8 May 2018 2:25 PM GMT
पूर्व मुख्यमंत्रियों को विशेष वर्ग का नागरिक मानना मनमाना और भेदभावपूर्ण है : पढ़िए लोक प्रहरी की याचिका पर अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा [निर्णय पढ़ें]
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मुख्यमंत्री जब पद छोड़ता है, तो वह एक आम नागरिक जैसा हो जाता है, हालांकि जिस पद पर वह रहा होता है, वह सुरक्षा और अन्य प्रोटोकॉल का अधिकारी होता है। पर सरकारी बंगले की आजीवन सुविधाएं संविधान के समानता के सिद्धांत के अनुरूप नहीं है।’

पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले में रहने का अधिकार नहीं है। यह निर्णय सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक बार जब कोई मुख्यमंत्री पद से हट जाता है, वह एक आम नागरिक बन जाता/जाती है और वह सरकारी बंगले में जीवन भर रहने का अधिकारी नहीं होता/होती। हालांकि, उसको सुरक्षा और प्रोटोकॉल का हक़ है।

न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष प्रश्न यह था कि पद से हटने के बाद भी सरकारी आवासों में रहना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है कि नहीं। एनजीओ लोक प्रहरी द्वारा दायर याचिका में उत्तर प्रदेश मिनिस्टर्स (सैलेरीज, अलाउंसेज एंड मिसलेनियस प्रोविजंस) एक्ट, 1981 की धारा 4(3) में किए गए संशोधन को चुनौती दी गई थी। इस संशोधन के द्वारा राज्य के पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन सरकारी बंगले आवंटित करने का प्रावधान किया गया है।

पूर्व मुख्यमंत्री आम आदमी से अलग नहीं हैं

पीठ ने कहा कि उक्त अधिनियम की धारा 4(3) का असर यह होगा कि राज्य में नागरिकों का एक विशेष वर्ग तैयार होगा जिसको उसके सरकारी पद पर रहने के कारण सार्वजनिक परिसंपत्तियां और लाभ वितरित किये जाएंगे। पीठ ने आगे कहा कि प्राकृतिक संसाधन, सार्वजनिक भूमि, और सरकारी बंगले/सरकारी आवास सरकारी संपत्तियाँ हैं जो इस देश की जनता का है।

“इसलिए...एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारी नौकर जिन्हें सार्वजनिक प्रकृति के कार्य सौंपे गए हैं, उन्हें इस तरह व्यवहार करना चाहिए ताकि यह लगे कि अंतिम अधिकार नागरिकों में निहित है और उन्हीं नागरिकों के प्रति वे जिम्मेदार हैं। इस तरह की स्थिति समानता के ढाँचे के अधीन ही बन सकती है जब सार्वजनिक पदों पर आसीन लोगों को मिले हर तरह के विशेषाधिकार और लाभ तार्किक, उचित और आनुपातिक हों।”

“निस्संदेह, 1981 के अधिनियम की धारा 4(3) का असर यह होगा कि वह नागरिकों का एक अलग वर्ग बनाएगा जिसको 28 तरह के लाभ दिए जाएंगे और सार्वजनिक पदों में रहने के कारण उनमें आम संपत्तियाँ बांटी जाएंगी। एक बार जब ऐसे लोग अपना पद छोड़ देते हैं, उनमें और एक आम नागरिक में कोई अंतर नहीं रह जाता। उनका सरकारी पद कभी होना इतिहास की बात हो जाती है और उनके लिए इस तरह का वर्गीकरण नहीं बनाया जा सकता कि वे इस पद पर रहने वाले पूर्व अधिकारी हैं और इसलिए नागरिकों की एक विशेष श्रेणी में आते हैं जो हर तरह की सुविधाओं और लाभ के हकदार होते हैं।”

कोर्ट ने कहा कि सरकारी पदों पर विगत में रहे लोगों को विशेष श्रेणी का नागरिक मानना मनमाना और भेदभावपूर्ण है और इसीलिए यह समानता के प्रावधानों का उल्लंघन करनेवाला है। यह एक ऐसा कानूनी करतब है जो कि असंगत और कानूनी रूप से अस्वीकार्य बातों पर आधारित है जिसे किसी भी तरह का संवैधानिक समर्थन नहीं है। कोर्ट ने यह कहते हुए अधिनियम के इस प्रावधान को गैरकानूनी घोषित कर दिया।

पीठ ने कहा कि इस क़ानून में राज्य सरकार ने जो संशोधन किया गया है वह लोक प्रहरी मामले में शीर्ष अदालत के निर्णय को निष्फल करने की कोशिश है। इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास उपलब्ध कराने का 1997 का नियम संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ है।


 
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