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कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा, एटीएम की ताकत किसी माँ की जगह नहीं ले सकता [आर्डर पढ़े]

LiveLaw News Network
29 April 2018 3:29 PM GMT
कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा, एटीएम की ताकत किसी माँ की जगह नहीं ले सकता [आर्डर पढ़े]
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सात वर्षीय एक लड़की की माँ की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की अनुमति देते हुए वृहस्पतिवार को कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा कि एक एटीम की ताकत माँ की जगह नहीं ले सकता। कोर्ट ने कहा कि आर्थिक हैसियत किसी को उसके बच्चे का संरक्षण प्राप्त करने से नहीं रोक सकता।

न्यायमूर्ति बुदिहल आरबी और न्यायमूर्ति केएस मुद्गल की पीठ ने कहा, “मातृत्व/पितृत्व के लिए पूर्णतया अलग तरह के गुण और सोच की जरूरत होती है एटीम के सामर्थ्य की नहीं। आप एटीम की ताकत के कारण माँ की जगह नहीं ले सकते। इसीलिए हमारे ग्रंथों में कहा गया है कि ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ – मतलब माँ और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होता है”

कोर्ट एक महिला की याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें उसने आरोप लगाया कि उसकी बहन और उसके पति ने उनकी बेटी को गैरकानूनी ढंग से अपने पास रखा है। याचिकाकर्ता का कनाडा में अपने पति से तलाक हो गया है और उसने अपनी बेटी को अपने पास रखने का अधिकार प्राप्त किया है। इसके बाद उसने अपनी बेटी को कनाडा से अपनी वापसी तक अपनी माँ के संरक्षण में दे दिया। इस बीच माँ, अपनी बेटी और दामाद के साथ रहने के लिए आ गई और ये लोग इस लड़की से भावनात्मक रूप से बहुत जुड़ गए। इसके बाद उन्होंने उसकी बेटी को वापस करने से मना कर दिया।

इस मामले के तथ्यों पर गौर करने के बाद कोर्ट ने कहा कि अगर ये दम्पति बच्चे को वापस नहीं करते हैं तो यह इसको गैरकानूनी ढंग से अपने पास रखने के बराबर होगा। कोर्ट ने कहा, “...इसससे आईपीसी की धारा 361 के तहत अगवा करने का मामला बनेगा। इसलिए इस बात में कोई दम नहीं है कि यह याचिका गलत है और यह बच्ची तनिष्का कानूनी तरीके से इस दंपति के पास रह रही है।”

प्रतिवादी (बहन का पति) ने इसके बाद कहा कि उनकी आय 26 लाख रुपए है और याचिकाकर्ता इस बच्ची को उस तरह के ऐशोआराम में नहीं रख सकती जो वे लोग उसे अभी दे रहे हैं। दूसरी और, याचिकाकर्ता ने कहा था कि प्रतिवादी मनोरोग जैसे स्वास्थय समस्या का शिकार है।

इसके बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ता की बहन के पति द्वारा सोशल मीडिया साइट्स पर लिखे गए एकतिपय पोस्ट पर गौर किया : “जो पोस्ट लिखे गए हैं वे यह दिखाते हैं कि प्रतिवादी अपनी ही माँ, मातृभूमि, अपनी साली और महिलाओं  के प्रति बहुत ही अपमानजनक धारणा रखता है। इन पोस्टों में आगे कहा गया है कि वह शराब पीता है, कामोद्दीपक चित्र और अस्वस्थ यौन क्रियाओं में लिप्त रहता है। ये पोस्ट्स शर्मनाक और अपमानजनक हैं...ये पोस्ट प्रतिवादी के मनोदशा को परिलक्षित करते हैं...”

इसलिए कोर्ट इस याचिका को स्वीकार करती है और प्रतिवादी को आदेश दिया दिया कि वह उस बच्ची को उसकी आचिकाकर्ता माँ को सौप दे।


 
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