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कार्यपालक अधिकारियों से तदर्थ जज बने लोग न्यायपालिका में स्वतः नहीं लिए जा सकते : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
24 April 2018 3:41 PM GMT
कार्यपालक अधिकारियों से तदर्थ जज बने लोग न्यायपालिका में स्वतः नहीं लिए जा सकते : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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एक महत्त्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कार्यपालक अधिकारियों (एग्जीक्यूटिव ऑफिसर) को स्वतः ही न्यायिक सेवाओं में सिर्फ इसलिए नहीं लिया जाएगा कि वे तदर्थ जज के रूप में कार्य कर रहे हैं।

न्यायमूर्ति एके सिकरी और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने गौहाटी हाई कोर्ट के फैसले को निरस्त करते हुए यह फैसला दिया।

वर्तमान मामले में अतिरिक्त उप आयुक्तों को अतरिक्त सत्र जजों का अधिकार देकर फास्ट ट्रैक अदालतों में जजों के रूप में तदर्थ नियुक्ति की गई थी। कुछ वर्षों के बाद इन लोगों ने अतिरिक्त सत्र जजों के रूप में सेवा नियमित किए जाने की मांग की और इसके लिए अरुणाचल प्रदेश न्यायिक सेवा नियम, 2006 के नियम 7 का हवाला दिया। हाई कोर्ट प्रशासन ने उनके इस आग्रह को अस्वीकार कर दिया और उनकी सेवाएं समाप्त कर दी। इस कदम से आहत इन लोगों ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी।

हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इन लोगों की बर्खास्तगी के आदेश को निरस्त कर दिया और आदेश दिया कि इन्हें अरुणाचल प्रदेश न्यायिक सेवा के तहत श्रेणी-1 के तहत बहाल करने के लिए परामर्श की प्रक्रिया शुरू करें। इसके बाद हाई कोर्ट प्रशासन ने इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि उपयुक्त प्रावधान सिर्फ तदर्थ नियुक्तियों के लिए हैं और यह कभी नहीं कहा गया कि उन्हें आवश्यक रूप से स्थाई नियुक्ति दे दी जाएगी। “...खुद ब खुद न्यायिक सेवाओं में ले लिए जाने का मामला यहाँ नहीं था। अगर मंशा यह होती तो इसके लिए अलग तरह के शब्द प्रयुक्त होते,” पीठ ने कहा।

पीठ हाई कोर्ट की इस बात से भी सहमत नहीं दिखा कि चूंकि इन लोगों ने लगभग 10 साल तक तदर्थ जजों के रूप में काम किया है और चूंकि ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है जो यह साबित कर सके कि वे अक्षम या भ्रष्ट हैं, उनकी सेवा नियमित कर दी जानी चाहिए थी।


 
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