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केंद्र ने भारत में महिला खतना की परंपरा पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दिशा निर्देश जारी करने का आग्रह किया

LiveLaw News Network
21 April 2018 5:49 AM GMT
केंद्र ने भारत में महिला खतना की परंपरा पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दिशा निर्देश जारी करने का आग्रह किया
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दाऊदी बोराह समुदाय में बच्चियों के खतना यानी फीमेल जेनिटल म्यूटलेशन ( FGM) की परंपरा पर प्रतिबंध लगाने के लिए दाखिल जनहित याचिका पर अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम  खानविलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की सुप्रीम कोर्ट की पीठ के सामने सुनवाई के दौरान अदालत द्वारा इस पर कदम उठाने और निर्देश जारी करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

“ केंद्र ने अपना जवाबी हलफनामा  दाखिल किया है ... यह मौजूदा कानूनों के तहत सात साल की कारावास के साथ दंडनीय अपराध है ..." AG ने कहा।

गौरतलब है कि आईपीसी की धारा 319 से 326 'स्वेच्छा से चोट पहुंचाने' और 'गंभीर चोट' के अपराधों से संबंधित है।

इसके अतिरिक्त  महाराष्ट्र विधायिका ने सामाजिक बहिष्कार (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2016 में महाराष्ट्र निषेध अधिनियम पारित किया है ताकि समुदाय द्वारा निर्धारित मानदंडों का पालन न करने के लिए जातिवासियों या किसी भी समुदाय द्वारा व्यक्तियों या परिवारों के सामाजिक बहिष्कार को प्रतिबंधित किया जा सके।

 इस तरह के व्यवहार को कारावास के साथ दंडनीय अपराध के रूप में परिभाषित किया गया  जो सात साल तक हो सकती है या 5 लाख तक का जुर्माना या दोनों हो सकता है।

शुक्रवार को न्यायमूर्ति चंद्रचूड ने दाऊदी बोहरा समुदाय के बीच FGM पर  वृत्तचित्र 'ए पिंच ऑफ स्किन' का उल्लेख किया। वरिष्ठ वकील आनंद ग्रोवर ने भी केंद्र का समर्थन किया कि "लोगों को पीड़ित" किया जा रहा है और पीठ को बताया कि केरल और तेलंगाना राज्यों ने भी जांच शुरू की है।

इससे पहले  न्यायालय ने महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और दिल्ली राज्यों को नोटिस जारी किया था। उन्होंने कहा था कि जुलाई में अंतिम निपटारे के लिए इस मामले को सूचीबद्ध किया जाए  दो राज्यों को याचिका की प्रतियां दी जाएं।

वकील सुनीता तिवारी द्वारा दायर की गई याचिका में कहा गया है कि दाऊदी बोहरा धार्मिक समुदाय के भीतर हर बच्ची का खतना करने की परंपरा को लेकर कुरान में कोई भी संदर्भ नहीं है और बिना किसी चिकित्सा कारण के किया जाता है।

 इसमें कहा गया है कि यह बचपन के दौरान गैर-चिकित्सकीय कारणों के लिए बच्चियों व महिलाओं पर किए गए अस्वच्छ और अवैध शल्य-चिकित्सा के कारण "पूरे देश में दाऊदी बोहरा समुदाय की लड़कियों और महिलाओं के लिए अत्याचार, शारीरिक दर्द, मानवता और मानसिक यातना पर पीड़ा को व्यक्त करता है।"

याचिकाकर्ता ने प्रार्थना की है कि इस परंपरा को  एक संज्ञेय, गैर-संगठित और गैर-जमानती अपराध के रूप में घोषित किया जाए।

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