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इंदू मल्होत्रा और जस्टिस के एम जोसफ पर केंद्र की चुप्पी पर 7 जजों की पीठ बने : जस्टिस कुरियन जोसफ ने CJI से कहा

LiveLaw News Network
12 April 2018 10:33 AM GMT
इंदू मल्होत्रा और जस्टिस के एम जोसफ पर केंद्र की चुप्पी पर 7 जजों की पीठ बने : जस्टिस कुरियन जोसफ ने CJI से कहा
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 पिछले महीने जस्टिस चेलामेश्वर  द्वारा व्यक्त की गई चिंता के बाद न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ ने मुख्य न्यायाधीश को लिखे  पत्र में  उत्तराखंड उच्च न्यायालय के  न्यायमूर्ति के एम जोसफ और वरिष्ठ वकील इंदू मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट में जज बनाए ​​  जाने के लिए कॉलेजियम  की सिफारिश पर बैठे रहने पर केंद्र  सरकार पर सवाल उठाए हैं।

जस्टिस कुरियन ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को संबोधित एक पत्र में इस तथ्य पर प्रकाश डाला है कि पहले कभी भी नहीं हुआ कि सर्वोच्च न्यायालय को तीन महीने के समाप्त होने के बाद भी सिफारिशों पर सरकार की ओर से कोई जानकारी नहीं दी गई।

 इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्ट के अनुसार इस पत्र में हालात पर एक त्वरित हस्तक्षेप की मांग की गई है जिसमें कहा गया है कि "यदि गर्भावस्था अवधि पूरी होने पर कोई सामान्य डिलीवरी नहीं हो रही है, तो तत्काल क्या किया जाता है, सिजेरियन सेक्शन। जब तक इस तरह का सर्जिकल हस्तक्षेप नहीं किया जाता है एक उपयुक्त समय पर गर्भ में बच्चा मर जाता है। "

पत्र, जिसकी प्रति सुप्रीम कोर्ट के सभी 22 जजों न्यायाधीशों को भी भेजी गई है, सरकार के कार्यों को "शक्ति का दुरुपयोग" और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए खतरा बताया गया है।

 यह आगे कहता है कि इससे न्यायाधीशों में एक "गलत संदेश"  जाएगा कि वे केंद्र की लाइन पर नहीं चलेंगे तो  "पीड़ा" भोगेंगे।

 यह स्पष्ट रूप से नहीं कहता लेकिन ये न्यायमूर्ति के एम जोसफ के सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति में देरी के संदर्भ में लगता है। उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागू करने की जांच करते हुए अप्रैल, 2016 में न्यायमूर्ति के एम जोसफ ने केंद्र के खिलाफ फैसला सुनाया था।

इसलिए न्यायमूर्ति जोसफ ने जोर देकर कहा कि सुप्रीम कोर्ट का " जीवन और अस्तित्व" खतरे में है और "इतिहास हमें माफ नहीं करेगा", अगर अदालत ने दोनों सिफारिशों पर बैठे केंद्र का जवाब नहीं दिया।

उन्होंने अब सीजीआई मिश्रा से अनुरोध किया है कि वे न्यायमूर्ति सीएस करनन  के मामले में न्यायालय द्वारा अपनाई गई नीति  के आधार पर  न्यायिक पक्ष के तौर पर सात वरिष्ठ न्यायाधीशों की पीठ स्थापित करें।

जस्टिस चेलामेश्वर ने पिछले महीने सीजीआई को एक पत्र लिखकर  उच्च न्यायालयों में जजों की नियुक्ति में सरकार के हस्तक्षेप के मामले पर चर्चा की मांग थी।  विशेष रूप से उन्होंने केंद्र के सीधे उच्च न्यायालयों से सम्पर्क करने की निंदा की थी और उन्होंने यह भी कहा था कि न्यायपालिका और सरकार के बीच "भरोसेमंद" होने से  लोकतंत्र की मौत की घंटी बजती है।”

कॉलेजियम की सिफारिशें 

कॉलेजियम ने 11 जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए इंदू मल्होत्रा ​​और जस्टिस जोसेफ की सिफारिश की थी।मल्होत्रा ​​की पदोन्नति की सिफारिश पर खुशी की लहर दौड़ी थी क्योंकि सीधे सुप्रीम कोर्ट में जज बनने वाली वो पहली महिला वकील होतीं।

इसके अलावा यह सुप्रीम कोर्ट में इस वक्त  पिछले तीन वर्षों से केवल एक महिला न्यायाधीश काम कर रही हैं।

न्यायमूर्ति आर बानुमति 29 अक्तूबर 2014 के बाद से सुप्रीम कोर्ट में एकमात्र महिला न्यायाधीश रही हैं जबसे न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई सेवानिवृत्त हुई हैं। न्यायमूर्ति जोसफ की नियुक्ति अब कुछ समय से पाइपलाइन में रही है।

उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति जोसफ ने उत्तराखंड राज्य में लगाए गए राष्ट्रपतिशासन को रद्द करने का फैसला सुनाया था। इसके बाद कॉलेजियम ने मई 2016 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय से आंध्र प्रदेश और तेलंगाना उच्च न्यायालय में स्थानांतरण करने की सिफारिश की थी। इसके बाद पिछले साल फरवरी में न्यायमूर्ति चेलामेश्वर ने न्यायमूर्ति के एम जोसफ को सुप्रीम कोर्ट में उन्नयन के लिए सिफारिश ना मानने पर सवाल उठाया था। जनवरी में न्यायमूर्ति जोसफ  की सिफारिश करते हुए  भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस जे चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एम बी  लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने कहा था कि  न्यायमूर्ति के एम जोसफ "भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए उच्च न्यायालयों के अन्य मुख्य न्यायाधीशों और वरिष्ठ न्यायाधीशों के मुकाबले अधिक योग्य और उपयुक्त" हैं।

 वास्तव में इस प्रस्ताव में विशेष रूप से उल्लेख किया गया था कि मुख्य न्यायाधीशों की वरिष्ठता और उच्च न्यायालयों के वरिष्ठ न्यायाधीश, उनकी योग्यता और अखंडता के अलावा उनके दिए फैसलों के आधार पर लिया जा रहा है।

 फिर भी जल्द ही ऐसी खबरें थीं जिनमें दावा किया गया था कि कानून मंत्रालय ने राष्ट्रपति को इसकी अग्रेषित किए बिना सिफारिश वापस भेज दी। हालांकि कुछ मीडिया हाउस ने इनकार कर दिया, जिन्होंने कानून मंत्रालय का हवाला देते हुए दावा किया कि समाचार गलत थे। इसके बाद यह रिपोर्ट आई कि केंद्र ने वरिष्ठता का हवाला देकर ये नियुक्ति रोक दी है।

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