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बेंच के गठन और केसों के आवंटन को ‘ मनमाना’ बताने वाली याचिका SC ने खारिज की, कहा, CJI खुद एक संस्थान [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
11 April 2018 7:33 AM GMT
बेंच के गठन और केसों के आवंटन को ‘ मनमाना’ बताने वाली याचिका SC ने खारिज की, कहा, CJI खुद एक संस्थान [निर्णय पढ़ें]
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देश मुख्य न्यायाधीश की श्रेष्ठता की पुष्टि करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आज वो याचिका खारिज कर दी जिसमें "मनमाने ढंग से" बेंच के गठन करने और विभिन्न बेंचों को केस सौंपने में CJI  की एकतरफा शक्ति पर सवाल उठाया गया और इसके लिए उचित नियम तैयार करने की मांग की गई थी।

CJI दीपक मिश्रा की अगवाई वाली पीठ ने "काम के मनमाने ढंग से आवंटन" के सभी आरोपों को खारिज करते हुए और जोर देकर कहा कि मुख्य न्यायाधीश सर्वोच्च संवैधानिक प्राधिकरण हैं। फैसले में कहा गया है कि CJI को बेंच बनाने और विभिन्न बेंचों को काम सौंपने की शक्ति सौंपी गई है क्योंकि शीर्ष अदालत में कामकाज चलाने के लिए उन पर संविधान ने विश्वास किया है।

 यह निर्णय न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड ने लिखा है  जो मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति ए।एम खानविलकर के साथ बेंच का हिस्सा थे। ऑपरेटिव भाग को पढ़ते हुए न्यायमूर्ति चंद्रचूड ने लखनऊ के वकील अशोक पांडे द्वारा दायर याचिका को "घोटाले" वाली बताते हुए कहा कि "संस्थागत परिप्रेक्ष्य से  मुख्य न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट के मामलों में शीर्ष पर हैं।मुख्य न्यायाधीश एक संस्था है। "

“ वो सर्वोच्च न्यायालय के मुखिया हैं और सर्वोच्च न्यायालय के मामलों के कुशल उनको कामकाज के लिए प्राधिकरण को सौंपा गया है और उन पर अविश्वास का अनुमान नहीं लगाया जा सकता , “ यह कहा गया है।

 “ न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए मुख्य न्यायाधीश पर बड़ी जिम्मेदारी है,” उन्होंने कहा। सर्वोच्च न्यायालय में मामलों के आवंटन और  मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की भूमिका पर   उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठ जजों द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद ये आदेश दिया गया है।

  दरअसल सर्वोच्च न्यायालय में बेंच के गठन करने  और विभिन्न बेंचों के अधिकार क्षेत्र के आवंटन के लिए एक प्रक्रिया विकसित करने को लेकर एक याचिका दायर की गई थी।  खास बात ये है कि शुक्रवार को याचिका को स्वीकार करते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड ने लखनऊ के वकील याचिकाकर्ता अशोक पांडे की संक्षिप्त बहस के बाद कहा, “ ठीक है। हम आदेश पारित करेंगे।”

 वकील पांडे की याचिका में कहा गया था : "याचिकाकर्ता सर्वोच्च न्यायालय में विभिन्न पीठों के गठन और अधिकार क्षेत्र के आवंटन के लिए एक निर्धारित प्रक्रिया तैयार करने के लिए प्रथम प्रतिवादी (सर्वोच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार) को आदेश की मांग करता  है।"

 याचिका में सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार को सर्वोच्च न्यायालय के नियमों में एक विशेष नियम रखने का भी आदेश जारी करने को कहा गया था  कि CJI कोर्ट में  तीन न्यायाधीशों की पीठ में CJI और दो वरिष्ठ न्यायाधीश हों।संविधान पीठ में 5 सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश हों  या तीन सबसे वरिष्ठ और दो सबसे कनिष्ठ न्यायाधीश हों।

"सर्वोच्च न्यायालय के चार सबसे वरिष्ठ  जज की प्रेस कॉन्फ्रेंस के साथ मुख्य न्यायधीश के बेंच बनाने और अधिकार क्षेत्र के निपटारे के संबंध में निर्धारित नियमों के अधिकार को विनियमित करने के लिए ये  मामला सार्वजनिक हुआ  इसलिए यह याचिका राष्ट्रीय / सार्वजनिक हित में है,” यह कहा गया था।

दरअसल चार सीनियर जज जस्टिस जे चेलामेश्वर, रंजन गोगोई, कुरियन जोसेफ और मदन बी लोकुर ने इस साल 12 जनवरी कोऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लिया था। जिस तरीके से सीजेआई ने "चुनिंदा" केस अपनी प्राथमिकता वाली  “ बेंच" को आवंटित किए, उस पर सवाल उठाया गया था। इस दौरान  सीजेआई को लिखे गए एक पत्र में  ये खुलासा हुआ।

 उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि "राष्ट्र और संस्था के लिए दूरगामी परिणाम वाले मामलों को सीजीआई द्वारा चुनिंदा रूप से अपनी वरीयता वाली बेंच में सौंपा गया है।” उन्होंने तर्क दिया था कि "चीजें क्रम में नहीं हैं" और "कई अवांछनीय बातें हो रही हैं।”

उन्होंने कहा था हालांकि CJI मास्टर ऑफ रोस्टर हैं (जो फैसला करते हैं कि किस मामले में कौन सी बेंच सुनवाई करेगी) लेकिन वो मनमानी कर रहे हैं।  हालांकि वह केवल ' बराबर में पहले हैं’ और श्रेष्ठ प्राधिकारी नहीं है। लेकिन वो ऐसा ही व्यवहार कर रहे हैं। उन्होंने कहा था, " ऐसे किसी भी कदम से संस्थान की अखंडता के बारे में संदेह पैदा होने के अप्रिय और अवांछनीय परिणाम होंगे।”

 पिछले हफ्ते वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने सर्वोच्च न्यायालय में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के प्रशासनिक प्राधिकरण पर स्पष्टीकरण मांगने के लिए जनहित याचिका दायर की है। इसमें रोस्टर के  मास्टर के रूप में चीफ जस्टिस के अधिकार और मामलों के आवंटन के लिए सिद्धांतों और प्रक्रियाओं का पालन करने के लिए नियम बनाने की मांग की गई है।


 
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