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प्रधानमंत्री की अनुमति के बिना एम्स में भारी भ्रष्टाचार के मामले को बंद करने के आरोप पर दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र को जारी किया नोटिस [याचिका पढ़े]

LiveLaw News Network
10 April 2018 1:51 PM GMT
प्रधानमंत्री की अनुमति के बिना एम्स में भारी भ्रष्टाचार के मामले को बंद करने के आरोप पर दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र को जारी किया नोटिस [याचिका पढ़े]
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दिल्ली हाई कोर्ट ने कई हजार करोड़ रुपए के भ्रष्टाचार के मामले को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा बंद कर देने पर सोमवार को केंद्र से स्पष्टीकरण माँगा है। इस मामले में आईएएस अधिकारी विनीत चौधरी सहित कई बड़े अधिकारी के कथित रूप से लिप्त होने की बात है। आरोप है कि इस मामले को प्रधानमंत्री के आदेश के बिना गैर कानूनी ढंग से बंद कर दिया गया।

दिल्ली हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गीता मित्तल और न्यायमूर्ति सी हरि शंकर की पीठ ने एक एनजीओ सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने इस मामले में केस का रिकॉर्ड तलब किया है। आरोप है कि इस मामले को स्वास्थय मंत्री जेपी नड्डा ने अनावश्यक रूप से बंद कर दिया है।

सीपीआईएल की पैरवी करते हुए एडवोकेट प्रशांत भूषण ने कोर्ट से कहा कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने एम्स के पूर्व निदेशक एमसी मिश्रा के खिलाफ 6000 करोड़ रुपए के भ्रष्टाचार के मामले को बंद कर दिया है और एम्स के उपनिदेशक विनीत चौधरी को छोड़ दिया जो अब हिमाचल प्रदेश के मुख्य सचिव के रूप में कार्य कर रहे हैं।

भूषण ने यह भी कहा कि 2015 में एम्स में लगी रहस्यमय आग में इस मामले से जुड़े संवेदनशील और महत्त्वपूर्ण रिकॉर्ड नष्ट हो गए और चौधरी को मामूली चेतावनी देते हुए अब इस मामले को बंद ही कर दिया गया और इस बारे में प्रधानमंत्री को भी विश्वास में नहीं लिया गया जबकि चौधरी केंद्र में पदस्थापना पर थे।

चौधरी पर वर्दी खरीदने, निर्माण का ठेका देने में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया है। इस भ्रष्टाचार का पता आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने लगाया जो उस समय एम्स में मुख्य सतर्कता अधिकारी के रूप में तैनात थे।

सीपीआईएल ने अपने आवेदन में आरोप लगाया है कि स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने उसी समय इस मामले को बंद करने की सिफारिश कर दी थी जब चतुर्वेदी एम्स में थे जबकि इस बारे में प्रधानमंत्री ही निर्णय ले सकते हैं क्योंकि वह डीओपीटी के इंचार्ज हैं।

अपनी याचिका में सीपीआईएल ने कहा है कि उसकी आशंका सच निकली है क्योंकि जेपी नड्डा के तहत केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने केंद्रीय सतर्कता आयोग की मिलीभगत से विनीत चौधरी के खिलाफ दो अनुशासनात्मक कार्रवाई को बंद कर दिया। चौधरी 2010-12 तक एम्स के उपनिदेशक (प्रशासन) थे और वे नड्डा के काफी नजदीकी हैं और वे उनके साथ हिमाचल प्रदेश के स्वस्थ्य सचिव के रूप में काम कर चुके हैं जब नड्डा वहाँ के स्वास्थ्य मंत्री थे।

चौधरी के खिलाफ इन मामलों का भंडाफोड़ चतुर्वेदी ने तब किया जब वे 2012-14 के दौरान एम्स के सीवीओ थे।

चौधरी ने इन सभी आरोपों से इनकार किया था और इस आरोप का भी खंडन किया कि कभी किसी कुत्ते का इलाज कैंसर वार्ड में किया गया। यह भी कि उन्होंने कोई गैर कानूनी नियुक्तियां नहीं की और कार्यालय का रेनोवेशन स्वास्थ्य मंत्रालय के पीएसयू ने किया और इससे उनको कोई लाभ नहीं हुआ।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने उनको सभी आरोपों से बरी कर दिया लेकिन जिस पार्किंग को उन्होंने बनवाया था वह उद्घाटन के दो महीने के भीतर ही गिर गया।

यह भी गौर करने वाली बात है कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने सीवीसी को चौधरी के खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों पर अपनी टिप्पणी के साथ रिपोर्ट भेजा था। उनके खिलाफ आरोपों का यह प्रारूप एम्स के सतर्कता प्रकोष्ठ ने तैयार किया था।

“(तत्कालीन) केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आज़ाद ने चौधरी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के आदेश दिए थे। पर अब इस मामले को बंद कर दिया गया है। एनजीओ ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि यह नियमों का सरासर उल्लंघन है।

उसने कहा कि एम्स के तत्कालीन प्रशासनिक उपनिदेशक शैलेश यादव, आईपीएस के खिलाफ मामले को स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा बंद कर दिया गया जबकि ऐसा सिर्फ गृह मंत्रालय ही कर सकता था जिसके अंदर वे आते थे।

एनजीओ ने कोर्ट से आग्रह किया है कि वह इस मामले में सभी उपलब्ध रिकॉर्ड तलब करे और प्रतिवादी नंबर एक को इन मामलों को शीघ्र एक उचित अनुशासनात्मक अथॉरिटी को सौंपने का निर्देश दे ताकि वह उपयुक्त आदेश दे सके।


 
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