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केरल हाईकोर्ट ने बच्चों की कस्टडी मामलों में फैमिली कोर्ट के लिए 'वैज्ञानिक दिशानिर्देश' जारी करने की 'बहिष्कृत' पतियों की याचिका खारिज की [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
9 April 2018 5:56 AM GMT
केरल हाईकोर्ट ने बच्चों की कस्टडी मामलों में फैमिली कोर्ट के लिए वैज्ञानिक दिशानिर्देश जारी करने की बहिष्कृत पतियों की याचिका खारिज की [निर्णय पढ़ें]
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न्यायालय द्वारा ऐसी विवेकाधीन शक्ति के इस्तेमाल को लेकर कोई भी दिशानिर्देश जारी कर नहीं किए जा सकते, जैसे कि  याचिकाकर्ताओं द्वारा मांग की गई है, खंडपीठ ने कहा। 

केरल उच्च न्यायालय ने हाल ही में बच्चों की कस्टडी की याचिकाओं पर फैसला करते वक्त बच्चों के कल्याण के आंकलन के लिए फैमिली कोर्ट को वैज्ञानिक मापदंड निर्धारित करने की 'बहिष्कृत' पतियों की याचिका खारिज कर दी है।

 पारिवारिक अदालतों में अपनी पत्नियों के खिलाफ मुकदमा लड़ रहे दस पतियों ने बच्चों की कस्टडी के मुद्दे पर  उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर शिकायत की थी कि ऐसे मामलों में पारिवारिक न्यायालयों में उद्देश्य मूल्यांकन आधारित किसी भी वैज्ञानिक मापदंड की कमी है।

उन्होंने तर्क दिया कि कस्टडी के आदेश न्यायाधीशों की व्यक्तिपरक संतुष्टि पर पूरी तरह से पारित हो जाते हैं और बच्चे के हितों को 'अक्सर एक नुकसान  होता है।’

याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय से भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 और गार्जियन एंड वार्ड एक्ट धारा 50 के प्रयोग में इस अदालत द्वारा तैयार किए गए नियमों में चाइल्ड राइट्स फाउंडेशन द्वारा ' चाइल्ड एक्सेस एंड विजिटेशन गाइडलाइंस ' नामक पुस्तक के दिशानिर्देशों को शामिल करने की भी अपील की।

 उनके अनुसार इस अध्ययन से पता चलता है कि न्यायिक मशीनरी की व्यक्तिपरक संतुष्टि परिवार अदालतों और अन्य अदालतों में लंबित विवादों में बच्चों की कस्टडी, दौरे के अधिकार, संरक्षकता आदि से संबंधित मामलों में बच्चे के सर्वोत्तम हित का निर्धारण करने के लिए वैज्ञानिक मानदंडों के साथ एक वास्तविक मूल्यांकन द्वारा प्रतिस्थापित होत जाती है।

 यह ध्यान देने योग्य है कि बॉम्बे उच्च न्यायालय, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय ने संबंधित राज्यों में संबंधित उच्च न्यायालयों और जिला और परिवार के न्यायालयों में इन चाइल्ड एक्सेस और कस्टडी संबंधी दिशानिर्देशों को परिचालित किया है। हालांकि मुख्य न्यायाधीश एंटनी डोमिनिक और न्यायमूर्ति दामा शेषाद्री नायडू की पीठ ने उनकी याचिका खारिज कर दी कि न्यायालय द्वारा इस तरह की विवेकाधीन शक्ति का प्रयोग किसी भी दिशानिर्देश जारी करने के लिए नहीं किया जा सकता।

लेकिन पीठ ने कहा: "यदि विधायिका संतुष्ट हैं कि किसी भी वैधानिक मानदंड से सत्ता के इस प्रयोग को विनियमित किया जाना है तो यह विधायिका के लिए कदम उठाने और किसी भी उचित कानून बनाने के लिए है क्योंकि ऐसा करने के लिए वो सक्षम  है।"

बेंच ने कहा: "जहां एक छोटे बच्चे की कस्टडी को लेकर लड़ रहे माता-पिता के बीच विवाद का विषय बन जाता है, न्यायालय को सबसे पहले बच्चे के कल्याण को ध्यान में रखते हुए मुद्दे पर निर्णय लेने की आवश्यकता होती है।

 यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कई अवसरों पर कहा भी  गया है कि इस तरह की प्रकृति के विवादों में कोर्ट द्वारा निर्णय लेने के लिए पार्टियों के कानूनी अधिकारों पर पूरी तरह से नहीं जाना चाहिए बल्कि उपरोक्त मानदंडों को देखना चाहिए।


 
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