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रोहिंग्या मामला राजनयिक स्तर का, राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए कोर्ट ना दे आदेश : केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा

LiveLaw News Network
20 March 2018 5:46 AM GMT
रोहिंग्या मामला राजनयिक स्तर का, राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए कोर्ट ना दे आदेश : केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा
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रोहिंग्या मुसलमानों को वापस म्यांमार भेजने के केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने फिर कहा है कि ये केंद्र सरकार के क्षेत्राधिकार का मामला है और सुप्रीम कोर्ट को इसमें दखल नहीं देना चाहिए।

ASG तुषार मेहता ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच के सामने कहा कि सरकार इस मामले का राजनयिक स्तर पर हल निकाल रही है और म्यांमार व बांग्लादेश से बातचीत कर रही है। ये राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है।

 इस दौरान याचिकाकर्ता ने रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए हेल्थ और बच्चों के लिए एजुकेशन देने की गुहार लगाई लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फिलहाल कोई अंतरिम आदेश देने से मना कर दिया। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने दलील दी कि ये मामला राजनयिक स्तर पर सुलझाने दिया जाए इसमें कोर्ट का दखल नहीं होना चाहिए। मेहता ने कहा कि याचिकाकर्ता मीडिया के हेडलाइन बनाने के लिए इस तरह के मामले उठाते हैं ऐसे मामले में आदेश पारित नहीं होना चाहिए।

इससे पहले याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि इस मामले में अंतरिम आदेश पारित किया जाना चाहिए। रोहिंग्या शरणार्थियों के बच्चों को बेसिक एजुकेशन और हेल्थ की सुविधाएं दी जाए।

वहीं केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि देश में रहने वाले हर शख्स को स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं दी जा रही है। इस मामले में देश के नागरिक या फिर विदेशी में कोई फर्क नहीं किया जाता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले में अंतिम सुनवाई 9 अप्रैल को होगी।

इससे पहले केंद्र ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपना पक्ष दोहराया कि  वह म्यांमार से आए रोहिंग्या शरणार्थियों को भारत में प्रवेश करने की इजाजत नहीं दे सकता और वकील प्रशांत भूषण द्वारा दाखिल अर्जी को खारिज किया जाना चाहिए।

 गृह मंत्रालय द्वारा दायर एक हलफनामे में केंद्र ने जोर देकर कहा कि भारत पहले ही "अन्य देशों के साथ असुरक्षित सीमाओं के कारण घुसपैठ की गंभीर समस्या का सामना कर रहा है जो देश में आतंकवाद फैलाने का मूल कारण है। “

इसके बाद कहा, "कानून के अनुसार किसी भी संप्रभु राष्ट्र द्वारा अपनी सीमा को सुरक्षित करना अनिवार्य रूप से कार्यपालिका का कार्य है और यह न्यायालय न सिर्फ केंद्र सरकार बल्कि सभी राज्य सरकारों को को रिट याचिका में निर्देश नहीं दे सकता जिनको यह सुनिश्चित करना है कि वो भारत में विदेशियों के प्रवेश को प्रतिवंधित करें।"

केंद्र ने आगे इन आरोपों को खारिज किया  कि सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने शरणार्थियों को वापस भेजने  के लिए मिर्च और बेहोशी वाले  हथगोले का इस्तेमाल किया है,

यह दावा करते हुए कि यह बात  "पूरी तरह से गलत, झूठी और सत्य से दूर" है।

उसने जोर देकर कहा, "... किसी भी सीमा सुरक्षा बल द्वारा उठाए जा रहे कदम कड़ाई से कानून के अनुसार, बड़े सार्वजनिक हित में और राष्ट्र के हित में हैं .. हमारे देश की सीमाओं की सुरक्षा के कार्य के साथ काम करने वाली सभी एजेंसियां ​​कड़े कानूनों के अनुसार अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रही हैं और बड़े राष्ट्रीय हित में मानवाधिकारों का पालन करती हैं। "

याचिका में दी गई प्रार्थनाओं को संबोधित करते हुए केंद्र ने ध्यान दिलाया है कि यह भारत 1951 के संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के लिए शरणार्थियों की स्थिति और इसके तहत जारी किए गए 19 67 के प्रोटोकॉल से संबंधित नहीं है।

 इसके बाद उसने कन्वेंशन के तहत जिम्मेदारी के तहत कहा, “ गैर-रिफॉइलमेंट का दायित्व अनिवार्य रूप से 1951 में उपरोक्त सम्मेलन के प्रावधानों द्वारा कवर किया गया है, जिसमें भारत एक हस्ताक्षरकर्ता नहीं है। यह प्रस्तुत किया गया कि भारत के चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश  भूटान, नेपाल, म्यांमार, के साथ मौजूदा अजीब भौगोलिक स्थिति को देखते हुए अपनी सीमा को साझा करते है।  यह इस माननीय न्यायालय के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में नहीं है कि इन मांगों को पूरा करने के निर्देश दिए  जाएं।”

 प्रस्तुत किया गया कि वह शरणार्थियों को कोई पहचान पत्र जारी नहीं कर सकता क्योंकि भारत कन्वेंशन का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है। यह आगे तर्क दिया कि जहां तक ​​पहले से ही देश में प्रवेश कर चुके रोहिंग्या का सवाल है, कोई भी मामला दर्ज नहीं किया गया है जिसमें उनके लिए चिकित्सा सहायता या शिक्षा से इनकार किया गया।

श्रीलंकाई तमिल शरणार्थियों को दी गई राहत सुविधाओं की तुलना पर शपथ पत्र में कहा गया कि इन सुविधाओं का अनुदान 1964 और 19 74 के भारत-श्रीलंका समझौतों की उत्पत्ति है। इन समझौतों के तहत भारत वापस लौट जाने के लिए सहमत हुआ था और 1981-82 तक भारतीय मूल के छह लाख व्यक्तियों को भारतीय नागरिकता प्रदान की गई।

मोहम्मद सलीमुल्ला और मोहम्मद शाकीर द्वारा दायर याचिकाओं के जवाब में ये हलफनामा दाखिल किया गया है जिसमें केंद्र के रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार वापस भेजने के कदम को चुनौती दी थी।

 याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करते हुए भूषण ने हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय में अर्जी दाखिल कर सरकार को रोहिंग्या  मुसलमानों को म्यांमार की सीमा पार करके भारत में प्रवेश करने से रोकने की दिशा में एक निर्देश जारी करने की मांग की गई थी। भूषण  ने भी देश में वर्तमान में रोहंग्या के रहने के लिए बेहतर स्थिति की मांग की थी।

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