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सुप्रीम कोर्ट ने हादिया और शफीन जहां की शादी को शून्य करार देने वाले केरल हाईकोर्ट के फैसले को रद्द किया [आर्डर पढ़े]

LiveLaw News Network
8 March 2018 1:07 PM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने हादिया और शफीन जहां की शादी को शून्य करार देने वाले केरल हाईकोर्ट के फैसले को रद्द किया [आर्डर पढ़े]
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एक बडे़ फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने हादिया उर्फ अखिला और शफीन जहां की शादी को शून्य करार देने वाले केरल हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया है।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड की बेंच ने गुरुवार को फैसला सुनाते हुए कहा कि हैबियस कारपस याचिका में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत शादी को शून्य करार नहीं देना चाहिए था।

पीठ ने कहा कि हादिया को अपने भविष्य के सपनों को पूरा करने की आजादी है। हादिया ने खुद कोर्ट में ये इच्छा प्रकट की थी। हालांकि NIA कानून के मुताबिक किसी आपराधिक केस की जांच कर सकती है।

27 नवंबर 2017  को सुप्रीम ने कोर्ट में मौजूद हादिया से पूछा था और हादिया ने साफ कहा था कि वो अपने पति के साथ रहना चाहती है। कोर्ट ने उसे अपनी मेडिकल पढाई पूरी करने के लिए तमिलनाडु के सेलम कॉलेज भेज दिया था।

इससे पहले हादिया ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल कर शफीन जहान के साथ पति- पत्नी के रूप में  रहने की अनुमति मांगी थी।

हलफनामे में हादिया ने स्पष्ट रूप से कहा कि उसने इस्लाम को गले लगा लिया है और शफीन जहान से अपनी स्वतंत्र इच्छा से शादी की है।

"इस्लाम के बारे में अध्ययन करने के बाद मैंने अपने विवेक से  अपनी इच्छा के अनुसार इस्लाम का विश्वास / धर्म को अपना लिया और इसके बाद मेरी पसंद के अनुसार अपनी इच्छा से मैंने एक व्यक्ति शफीन जहां से शादी की,

जो यहां याचिकाकर्ता है, हालांकि, इस तथ्य के बावजूद कि मैंने शपथ पत्र पर बार-बार मेरे वकील के माध्यम से और व्यक्तिगत रूप से, जैसा कि मामला है, केरल के माननीय उच्च न्यायालय के सामने प्रस्तुत किया है कि मैंने उपरोक्त विकल्प (मेरे धर्म और मेरे जीवन-साथी ) मेरी अपनी इच्छा से चुना है लेकिन उच्च न्यायालय की पीठ ने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया,”  उसने कहा था।

“ मैं सबसे विनम्रतापूर्वक प्रार्थना करती हूं कि मेरी पूरी स्वतंत्रता मेरे साथ बहाल हो जाए और शफीन जहान (उपरोक्त विशेष छुट्टी याचिका में याचिकाकर्ता) मेरे पति हैं, मैं अपने प्यारे पति शफीन जहान की पत्नी के रूप में रहना चाहती  हूं। मैंने इस्लाम को गले लगा लिया है और अपनी इच्छा से शादी कर ली। मैं आगे प्रार्थना करती हूं कि यह माननीय न्यायालय मेरे पति को अभिभावक के रूप में नियुक्त करने के लिए पर्याप्त है।  मैं सबसे विनम्रतापूर्वक प्रार्थना करती हूं कि इस माननीय न्यायालय द्वारा हमें पति और पत्नी के रूप में एक साथ रहने के लिए अनुमति देने की कृपा हो। इसलिए मैं  विनम्रतापूर्वक प्रार्थना करती हूं कि माननीय उच्च न्यायालय द्वारा पारित किए गए निर्णय को दूर करके इस माननीय न्यायालय द्वारा  उपरोक्त याचिका की अनुमति देने की कृपा की जाए,”  हादिया ने कहा था।

ये मामला हादिया  के हिंदू से मुस्लिम धर्म में परिवर्तन कर मुस्लिम युवक से निकाह का मामला है। पिछले साल 25 मई को केरल हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस निकाह को शून्य करार दे दिया था और युवती को उसके हिंदू अभिभावकों की अभिरक्षा में देने का आदेश दिया था। इस दौरान जस्टिस सुरेंद्र मोहन और जस्टिस अब्राहम मैथ्यू ने विवादित टिप्पणी करते हुए कहा था कि 24 साल की युवती कमजोर और जल्द चपेट में आने वाली होती है और उसका कई तरीके से शोषण किया जा सकता है। चूंकि शादी उसके जीवन का सबसे अहम फैसला होता है इसलिए वो सिर्फ अभिभावकों की सक्रिय संलिप्ता से ही लिया जा सकता है।

वहीं हादिया के पति ने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और कहा कि हाईकोर्ट ने बिना किसी कानूनी आधार के निकाह को शून्य करार दिया है। याचिका में कहा गया है कि ये फैसला आजाद देश की महिलाओं का असम्मान करता है क्योंकि इसने महिलाओं को अपने बारे में सोच विचार करने के अधिकार का छीन लिया है और उन्हें कमजोर व खुद के बारे में सोचविचार करने में असमर्थ घोषित कर दिया है। ये आदेश महिलाओं के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।

दरअसल 17 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की  सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस आरवी रविंद्रन की देखरेख में NIA जांच के आदेश दिए थे लेकिन निजी कारणों का हवाला देते हुए जस्टिस रविंद्रन ने जांच की देखरेख करने से इंकार कर दिया था।


 
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