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विदेशी कोर्ट में भारतीय को मिली सजा पर गौर हो सकता है, पर भारतीय अदालतों के लिए लिए यह बाध्यकारी नहीं : बॉम्बे हाई कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
4 March 2018 5:00 AM GMT
विदेशी कोर्ट में भारतीय को मिली सजा पर गौर हो सकता है, पर भारतीय अदालतों के लिए लिए यह बाध्यकारी नहीं : बॉम्बे हाई कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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बॉम्बे हाई कोर्ट ने वृहस्पतिवार को कहा कि किसी भारतीय को किसी विदेशी अदालत में दोषी ठहराए जाने के मामले पर भारत के अथॉरिटीज और उसकी अदालतें इस पर गौर कर सकती हैं पर इस तरह के फैसले ऐसे अथॉरिटीज के लिए किसी भी तरह बाध्यकारी नहीं होंगे।

न्यायमूर्ति बीआर गवई, केआर श्रीराम और बीपी कोलाबावाला की पीठ ने कहा, “हमारा मानना है कि भारत में हुए अपराध के लिए अगर किसी व्यक्ति को किसी विदेशी अदालत ने दोषी ठहराया है तो भारत के न्यायिक और अर्ध न्यायिक अथॉरिटीज इस पर चाहें तो गौर कर सकते हैं पर यह नहीं कहा जा सकता कि इन अथॉरिटीज को ये फैसले मानने ही होंगे”।

कोर्ट ने यह फैसला लीलावती हॉस्पिटल के ट्रस्टी प्रबोध मेहता की याचिका पर गौर करते हुए दिया।

कोर्ट ने कहा कि एकल जज ने अविनाश कुमार भसीन बनाम एयर इंडिया, बॉम्बे और गोविन्द केशेओ पोवार बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में खंड पीठ द्वारा दिए गए फैसले में विरोधाभास पाया।

अविनाश कुमार के मामले में कोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को किसी देश में सजा दी जाती है तो इस पर किसी भी देश द्वारा किसी भी उद्देश्य से गौर किया जा सकता है। गोविन्द केशेओ पोवार के मामले में कोर्ट ने कहा कि “किसी व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध का उस राज्य की सीमा के बाहर कोई अर्थ नहीं है जिस राज्य की सीमा में यह हुआ है”।

अपने समक्ष मौजूद विरोधाभासी फैसलों पर गौर करते हुए कोर्ट ने कहा कि गोविन्द केशेओ पोवार के मामले में प्रश्न यह था कि क्या किसी विदेशी कोर्ट में दोषी पाए जाने या सजा सुनाए जाने के फैसले पर भारत में अदालतों को गौर करना चाहिए कि नहीं।

कोर्ट ने इसके बाद अपने फैसले में कहा कि अदालत इस तरह के फैसलों पर गौर कर सकता है पर भारत की अदालतें इनको मानने के लिए बाध्य नहीं होंगे।


 
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