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सोहराबुद्दीन मामले में सीबीआई के दृष्टिकोण पर सवाल उठाने वाली जस्टिस रेवती डेरे अब नहीं करेंगी मामले की सुनवाई

LiveLaw News Network
26 Feb 2018 4:18 PM GMT
सोहराबुद्दीन मामले में सीबीआई के दृष्टिकोण पर सवाल उठाने वाली जस्टिस रेवती डेरे अब नहीं करेंगी मामले की सुनवाई
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 जस्टिस रेवती मोहिते डेरे, जो अभी तक बॉम्बे हाईकोर्ट में सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले में पुनरीक्षण याचिका सुन रही थीं,  अब मामले की सुनवाई नहीं करेंगी क्योंकि सीटिंग सूची बदल दी गई है। 26 फरवरी, 2018 से प्रभावी नई सीटिंग सूची के अनुसार, न्यायमूर्ति एनडब्ल्यू सांबरे पुनरीक्षण याचिकाओं को सुनेंगे।

 ये तबादला विशेष रूप से दिलचस्प है कि कैसे न्यायमूर्ति डेरे ने इस मामले में सीबीआई के दृष्टिकोण को लगातार खारिज किया था।

सबसे पहले  29 जनवरी को सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने सवाल किया था कि कैसे सीबीआई पुनरीक्षण के आवेदनों पर एक तेज सुनवाई की मांग की जरूरत नहीं समझ रही जबकि सीबीआई की विशेष अदालत में नवंबर में सुनवाई शुरु हो चुकी है।

 मामले में सीबीआई की तरफ से उपस्थित होने वाले एएसजी अनिल सिंह ने अदालत द्वारा उठाए गए कुछ सवालों के उत्तर देने के लिए सुनवाई तीन सप्ताह के लिए स्थगित करने की मांग की थी।

 पहले सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति डेरे ने सवाल उठाया था कि क्या पूर्व अनुमति की कमी अभियुक्तों को आरोपमुक्त करने का पर्याप्त कारण था और उन्होंने सीबीआई से ये भी पूछा कि उन्होंने गुजरात के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के निर्वहन के आदेश को चुनौती देने का फैसला क्यों नहीं किया ?

सीबीआई की चार्जशीट में कुल 38 अभियुक्तों का नाम रखा गया जिनमें भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी शामिल हैं। इनमें से 15 को पहले ही ट्रायल कोर्ट  द्वारा मामले से आरोपमुक्त कर दिया गया।  42 गवाहों में से जांच के दौरान 34 पहले ही मुकर चुके हैं।

12 फरवरी की सुनवाई में जिस दिन सीबीआई अदालत में दो और गवाह मुकर गए, न्यायमूर्ति डेरे ने कहा था कि अदालत को  केंद्रीय एजेंसी से उचित सहायता नहीं मिल रही है।

उन्होंने एएसजी अनिल सिंह से कहा था; "क्या यह सुनिश्चित करने की सीबीआई की ज़िम्मेदारी नहीं है कि उसके गवाहों की रक्षा की जाए ताकि वे अभियुक्तों के खिलाफ निडर हो जाएं? यह देखते हुए कि कई गवाह विशेष सीबीआई अदालत के सामने मुकर चुके हैं, क्या आप उनके लिए कोई सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं? आपकी ज़िम्मेदारी आरोप पत्र दाखिल करने में ही पूरी नहीं होती है। यह आपका कर्तव्य है कि आप अपने गवाहों की रक्षा करें। "

यह टिप्पणियों इतनी महत्वपूर्ण इसलिए हो गईं थीं क्योंकि एक तथ्य ये भी था कि दो और गवाह मुकर गए थे और उन्होंने विशेष सीबीआई अदालत में सीबीआई के मामले को समर्थन देने से इंकार कर दिया था।

जब एएसजी सिंह ने फिर से अदालत के सवालों का जवाब देने के लिए समय मांगा, न्यायमूर्ति ने कहा: "आप एक मूक दर्शक नहीं हो सकते। मुझे इस तरह की सहायता नहीं मिली है जो मुझे सीबीआई से मिलनी चाहिए थी। यदि यह आपका रवैया है, तो आप ट्रायल भी क्यों कर रहे हैं? "

कुछ दिन पहले 22 फरवरी को वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने दावा किया था कि सोहराबुद्दीन को 2005 में सीबीआई ने गिरफ्तार किया था, उसे सीबीआई ने गोली मार दी थी क्योंकि उसने गिरफ्तारी से बचने की कोशिश की, लेकिन एक "राजनीति- प्रेरित सीबीआई" ने नकली मुठभेड़ की एक कहानी बनाई।

 जेठमलानी ने कहा: "मैं सिर्फ यह कहने की कोशिश कर रहा हूं कि आज (सीबीआई) ज्यादा संतुलित है।" न्यायमूर्ति डेरे ने जवाब दिया: "क्या इसी वजह से ये इस अदालत को मदद करने से इनकार कर रही है ? “

 यह एक महत्वपूर्ण सवाल है जो अभी तक अनसुलझा है। सीबीआई और सोहराबुद्दीन के भाई रबाबुद्दीन द्वारा दायर की गईं पुनरीक्षण याचिका लंबित हैं तो सोहराबुद्दीन, तुलसीराम प्रजापति और कौसर बी की फर्जी मुठभेड़ के कथित मामले का ट्रायल अलग- अलग नहीं हुआ है।

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