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जजों की नियुक्ति प्रक्रिया के हर स्तर की समय सीमा निर्धारित की जानी चाहिए : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
24 Feb 2018 4:20 AM GMT
जजों की नियुक्ति प्रक्रिया के हर स्तर की समय सीमा निर्धारित की जानी चाहिए : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया के हर स्तर की समय सीमा तय की जानी चाहिए ताकि नियुक्ति की प्रक्रिया एक निश्चित समय सीमा के तहत पूरी की जा सके।

जजों की नियुक्ति में होने वाली देरी पर चिंता जताते हुए न्यायमूर्ति एके सिकरी और अशोक भूषण ने कहा :

“सुप्रीम कोर्ट ने  Supreme Court Advocates­on­Record Association and Others v. Union of India, (1993) 4 SCC 441, मामले में यह स्पष्ट किया था कि नियुक्ति की प्रक्रिया संभावित रिक्तियों के पैदा होने से कम से कम एक महीना पहले शुरू की जानी चाहिए। ऐसा एक आदर्श स्थिति प्राप्त करने के लिए किया गया जैसे पद खाली होने के बाद उसको तुरंत भरा जा सके ताकि कोई समय जाया न हो। दुर्भाग्य से, ऐसा अभी तक नहीं हो पाया है”।

कोर्ट ने कहा, “पहला तो यह कि उच्च न्यायालयों द्वारा समय पर नामों की सूची नहीं भेजी जाती। पद रिक्त होने से एक महीना पहले संभावित लोगों के नामों की सूची भेजने की बात को छोड़िए, पद रिक्त हो जाने के काफी समय बाद तक भी यह सूची नहीं आती है। यह भी देखा गया है कि एक बार जब नाम भेज दिए जाते हैं, कॉलेजियम के विचारार्थ इसको अपने इनपुट के साथ भेजने के पहले कार्यपालिका के स्तर पर ये अनावश्यक रूप से लंबे समय तक के लिए लटके रहते हैं। कॉलेजियम द्वारा नामों पर मुहर लगा दिए जाने के बाद भी कार्यपालिका के स्तर पर ये लंबित रहते हैं। इन सबकी वजह से नियुक्ति में भारी देरी होती है”।

पीठ ने यह भी कहा कि कई बार तो नाम भेजने से लेकर नियुक्ति तक पूरी प्रक्रिया पूरी करने में एक साल से अधिक समय लग जाता है।

 “कई बार तो नामों की सूची भेजने से लेकर नियुक्ति तक में एक साल से अधिक का समय लग जाता है। निचली न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारियों की हाई कोर्ट में नियुक्ति के लिए अनुशंसा की जाती है पर इस पूरी प्रक्रिया में इतना अनावश्यक समय लग जाता है कि यह उनकी सेवा अवधि को भी प्रभावित करता है। यह सबको पता है कि अधिकाँश न्यायिक अधिकारियों को उच्चतर न्यायपालिका में नियुक्ति का अवसर उस समय मिलता है जब उनकी सेवा के बहुत कम समय बचे रहते हैं। इस स्थिति में जब अनावश्यक देरी होती है तो इस कम समय की सेवा अवधि और भी कम हो जाती है। इससे ऐसी स्थिति पैदा होती है जैसी अभी हुई है।  फिर बार के सदस्य जिनके नामों की अनुशंसा हाई कोर्ट में नियुक्ति के लिए की जाती है, उनको अलग तरह की परेशानियां झेलनी पड़ती है”, कोर्ट ने कहा।

पीठ ने यह भी कहा कि इस तरह के लोगों का भाग्य अनिश्चित काल के लिए अनिर्णय की स्थिति में लटका रहता है। इससे ऐसी स्थिति पैदा होती है जो बहुत सुखद नहीं होती और जिसे टाला जा सकता था।

पीठ दो जिला जजों को हाई कोर्ट में नियुक्त करने के निर्णय को चुनौती वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान उक्त बातें कही। ये जज 2016 में रिटायर हो गए।

नियुक्ति को सही ठहराते हुए पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 217 (2)(a) के तहत रिटायर हो चुके न्यायिक अधिकारियों की हाई कोर्ट जज के पद पर नियुक्ति हो सकती है।


 
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