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बॉम्बे हाई कोर्ट के खिलाफ जालसाजी करने वाले मुकदमादारों और वकील के खिलाफ न्यायमूर्ति जीएस पटेल ने शुरू की अवमानना की कार्रवाई [आर्डर पढ़े]

LiveLaw News Network
15 Feb 2018 5:55 AM GMT
बॉम्बे हाई कोर्ट के खिलाफ जालसाजी करने वाले मुकदमादारों और वकील के खिलाफ न्यायमूर्ति जीएस पटेल ने शुरू की अवमानना की कार्रवाई [आर्डर पढ़े]
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बॉम्बे हाई कोर्ट के जज जीएस पटेल ने कहा कि हमारे कमर्शियल मुकदमेबाजी की व्यवस्था में सड़ांध पैदा हो गया है। यह मामला इसका उदाहरण है। अगर कभी कोर्ट के खिलाफ किसी फर्जीवाड़े का जिक्र होगा तो इस मामले का उल्लेख जरूर किया जाएगा।

इस मामले में जितेंदरपाल सिंह चड्ढा नामक मुकदमेदार, उसके श्वसुर प्रिथिपाल चड्ढा और इनके वकील दत्तात्रेय परब ने मिलीभगत से ‘व्यवस्था का फ़ायदा उठाया’ और उन्होंने एक ही परिसंपत्ति के खिलाफ एक ही साथ मामले दायर लड़े।

मामले की पृष्ठभूमि

न्यायमूर्ति पटेल चैम्बर सम्मन के आवेदन पर सुनवाई कर रहे थे जिसे फुलरटन इंडिया क्रेडिट कंपनी लिमिटेड ने दायर किया था। याचिकाकर्ताओं ने मुंबई के संभ्रांत खार इलाके में एक फ्लैट की कुर्की की अपील की क्योंकि इसके मालिक जितेंदरपाल चड्ढा ने ऋण भुगतान समय पर नहीं किया था।

इस फ्लैट को फुलरटन के पास रेहन रख दिया गया और उसने 9,06,85,020 रुपए से अधिक का ऋण 30 जुलाई 2014 को लिखे एक पत्र के माध्यम से टोर्नेडो मोटर्स प्राइवेट लिमिटेड के नाम जारी कर दिया। जितेंदरपाल सह-ऋणी था और उसने यह फ्लैट सिक्यूरिटी के रूप में दिया था।

फुलरटन को सोसाइटी से पता चला कि इस फ्लैट को तो पहले ही 26 मार्च 2013 को इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड को रेहन पर दिया जा चुका है। इस तरह फुलरटन ने जो ऋण दिया उसका एक हिस्सा वह इंडियाबुल्स को देने पर राजी हो गया ताकि वह इस पर अपना दावा छोड़ दे।

फुलरटन और जितेंदरपाल ने 31 जुलाई 2014 को एक फैसिलिटी अग्रीमेंट किया जिसके तहत 4,06,02,793 रुपए इंडियाबुल्स को रेहन की राशि के भुगतान के रूप में दिया गया। इसके बाद इंडियाबुल्स ने 20 अगस्त 2014 को प्रतिवादी के साथ एक रजिस्टर्ड करारनामा किया।

20 अगस्त 2014 को जितेंदरपाल ने फुलरटन के साथ गिरवी का एक आम करारनामा किया। इस करारनामे को अँधेरी के सब-रजिस्ट्रार के पास पंजीकृत कराया। इसके बाद टोर्नेडो मोटर्स और जितेंदरपाल ने फुलरटन को ऋण की राशि का भुगतान नहीं किया। फुलरटन ने एसएआरएफएईएसआई अधिनियम 2002 के तहत कार्रवाई की और इस दौरान चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के पास एसएआरएफएईएसआई अधिनियम की धारा 14(2) के तहत जबरदस्ती कब्जा लेने की कार्रवाई की अपील की।

जितेंदेर्पल ने सीमएम के समक्ष यह कहते हुए एक आवेदन दिया कि 6 नवंबर 2014 को दावेदार प्रिथिपाल सुरेन्द्रपाल चड्ढा के फेवर में एक पंचाट का फैसला है। सीएमएम को बताया गया कि पृथीपाल ने इस फैसले पर अमल के लिए हाई कोर्ट में अपील कर 27 अप्रैल 2016 (केआर श्रीराम जे) को एक आदेश प्राप्त कर लिया जिसके आधार पर इस फ्लैट के लिए कोर्ट ने एक रिसीवर नियुक्त कर दिया। सीएमएम को कहा गया कि फ्लैट अब इस कोर्ट के पास क़ानून के कब्जे में है और इसलिए इसके कब्जे को लेकर कोई आदेश पास नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने इसके बाद बताया कि प्रिथिपाल कौन है -

“...जैसा कि मालूम हुआ है, वह और कोई नहीं, जितेंदरपाल का श्वसुर है. जैसा कि इतना ही काफी नहीं था, इस फैसले के आदेश पर गौर किया जाए जिसके बारे में प्रिथिपाल कह रहा है कि उसने अपने दामाद के खिलाफ कोर्ट से प्राप्त किया है।

मुझे यह जानकर अफ़सोस हो रहा है कि मध्यस्थ इस कोर्ट का एक एडवोकेट था जिसके खिलाफ उसकी भूमिका के लिए मेरा अलग से एक नोटिस जारी करने का प्रस्ताव है। यह आदेश इस दृष्टि में बहुत ही आश्चर्यजनक और असाधारण है कि यह क्या करने जा रहा है और क्या किया हैइसने कोर्ट के साथ सुनियोजित तरीके से जालसाजी किया है...”

इस आदेश के कुछ प्रतिफल इस तरह से थे -

(i)  प्रिथिपाल का अपने दामाद जितेंदरपाल के साथ फ्लैट बेचने का करार मौखिक था इसके खिलाफ मध्यस्थ से आदेश की याचना की गई;

(ii)   मध्यस्थ, एडवोकेट परब को कहा गया कि वह 4 नवंबर 2014 के पत्र के आधार पर कार्रवाई करे;

(iii)  आरोप है कि  कुछ भुगतान 27 सितम्बर 2012 को किया गया पर अधिकाँश भुगतान तथाकथित करार के एक दिन पहले किया गया, यानी 3 नवंबर 2014 को;

(iv)  इसकी कुल राशि 9.8 करोड़ रुपए की थी जो कि फुलरटन द्वारा दिए गए ऋण के लगभग बराबर है।

“...ऐसा लगता है कि परब ने यह आदेश स्टाम्प पेपर पर 29 सितम्बर 2014 को दिया. इस आदेश के ऑपरेटिव हिस्से में कहा गया है कि जितेंदरपाल को 3,94,48,954 रुपए की राशि अपने श्वसुर को 24% (जो कि बहुत ही असाधारण है) प्रतिमाह ब्याज के साथ देना था और अगर वह ऐसा नहीं कर पाता है तो यह फ्लैट जितेंदरपाल के श्वसुर को दे दिया जाएगाबिना शेष राशि के भुगतान के”, कोर्ट ने कहा।

श्वसुर-दामाद की इस जोड़ी ने इस फ्लैट के लिए रिसीवर तैनात करने के लिए आवेदन दिया। कोर्ट ने इस और इंगित किया कि कैसे श्वसुर और दामाद की जोड़ी ने सावधानी पूर्वक अलग-अलग लीगल रिप्रजेंटेशन लिया।

न्यायमूर्ति पटेल ने कहा, “जितेंदरपाल ने अपने वकील के माध्यम से कहा कि वह वित्तीय संकट में है, फ्लैट को पहले ही कुर्क कर लिया गया है और इसलिए उसने कोर्ट से चैम्बर ऑफ़ सम्मन में राहत देने की मांग की।

फैसला

कोर्ट ने कहा, “अपने ध्येय की प्राप्ति के लिए कोर्ट की प्रक्रिया की पूरी तरह धज्जियां उड़ाई गईं और समझौते किए गए। यह न्याय के प्रशासन में बहुत निंदनीय दखलंदाजी है।”


 
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