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जज लोया के मौत के मामले की सुनवाई का दूसरा दिन : वरिष्ठ वकीलों दवे, सिसोदिया और साल्वे में तकरार

LiveLaw News Network
6 Feb 2018 4:40 AM GMT
जज लोया के मौत के मामले की सुनवाई का दूसरा दिन : वरिष्ठ वकीलों दवे, सिसोदिया और साल्वे में तकरार
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सोमवार को जज लोया मामले में अदालत में बहुत ही महत्त्वपूर्ण बहस हुई। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़   की पीठ ने जैसे ही मामले की सुनवाई शुरू की,  बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने ने अतिरिक्त साक्ष्य पेश करने की अनुमति मांगी जिसमें जज लोया के पिता और उनकी बहन की वीडियो रिकॉर्डिंग भी शामिल है।

 इसके बाद वरिष्ठ वकील वी गिरी ने राज्य खुफिया विभाग के आयुक्त की 2017 में हुई इस मामले की जांच में विरोधाभासी बातों का जिक्र किया – “रिपोर्ट में कहा गया है कि 1 दिसंबर 2014 को लगभग 4 बजे सुबह लोया ने अपनी छाती में दर्द की शिकायत की और उनको दांडे अस्पताल ले जाया गया। वहाँ से लगभग 5 बजे सुबह उन्हें मेडिट्रिना अस्पताल ले जाया गया और उस समय उनके साथ दो अलग-अलग कार में  जज बर्डे, मोदक और कुलकर्णी थे। रास्ते में ही लोया की मौत हो गई। लगभग 7 बजे सुबह में बॉम्बे हाई कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश और हाई कोर्ट के दो अन्य जज भी मेडिट्रिना अस्पताल पहुँचे।”

 विसंगतियों पर प्रकाश डालते हुए गिरी ने कहा, “ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है जो यह साबित कर सके कि जज लोया नागपुर के रवि भवन सरकारी गेस्ट हाउस में रुके थे। दांडे अस्पताल की कोई भी मेडिकल रिपोर्ट नहीं है और डॉक्टरों से बातों की पुष्टि भी नहीं की गई है। साथ ही साथ, ईसीजी रिपोर्ट भी नहीं है।”

 उन्होंने आगे कहा, “सिताबर्दी थाने ने 8.33 बजे सुबह डॉ. प्रशान्त राठी का बयान दर्ज किया। पोस्ट मार्टम डॉ. तुमरम ने  1 दिसंबर 2014 की सुबह 10 बजे किया।

 औचक मृत्यु की केस डायरी 4 बजे शाम को सदर पुलिस थाने को भेजी गई।

 सिताबर्दी थाने के सिपाही पंकज द्वारा डॉ. राठी को शव सौंपने के तथ्य का सत्यापन नहीं होता है। फिर, जब सारे रिकॉर्ड सदर थाने को भेज दिए गए तो कैसे शव सिताबर्दी के एक सिपाही ने सौंपा?”

मामले की स्वतंत्र जांच जरूरी है इसके कारण पर जोर डालते हुए गिरी ने कहा, “राज्य के खुफिया विभाग के आयुक्त की 23 नवंबर 2017 की चिट्ठी बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लिखी गई थी जिसमें चार न्यायिक अधिकारी और उच्च न्यायालय के दो जजों का उल्लेख किया गया है जो कथित रूप से जज लोया के शव के साथ गए। इस तरह के निष्कर्ष पर जांच से पहले कैसे पहुंचा जा सकता है? फिर, न्यायिक अधिकारियों से मिलने का समय लेने के बदले हाई कोर्ट से अनुमति मिलने के बाद, आयुक्त ने उनको पत्र भेजा। आयुक्त ने यह कहा है कि मामले की जानकारी रखने वाले लोगों के बयान लिए गए और उनका सत्यापन भी किया गया है। लेकिन कैसे? उन्होंने तो सिर्फ न्यायिक अधिकारियों से भेंट की और इससे जुड़े अन्य लोगों के बयान रिकॉर्ड नहीं किए। यहाँ तक कि प्रशांत राठी का बयान भी किसी अन्य व्यक्ति ने लिया। ऐसा लगता है कि उन्होंने मुंबई में बैठे-बैठे ही जांच पूरी कर ली।”

“दांडे अस्पताल के मेडिकल अफसर से कोई पूछताछ नहीं हुई। इस बात को लेकर भ्रम है कि लोया को जज बर्डे की कार में ले जाया गया जिसमें जज कुलकर्णी, मोदक और रुपेश राठी भी थे या नहीं। डॉ. पंकज हरकुत जो कि मेडिट्रिना में न्यूरोसर्जन हैं, उनका बयान नहीं लिया गया। यह भी स्पष्ट नहीं है कि एक न्यूरोसर्जन की जरूरत क्या पड़ी। जांच और ठोस होनी चाहिए थी। यह घटना 2014 में हुई और आयुक्त इतने निश्चिंत क्यों थे ?  नागपुर में उनको कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो कि उस वाकये की जानकारी रखता हो जिसकी जांच की गई? उनको मेडिट्रिना अस्पताल का दौरा करना चाहिए था और डॉ. रोहन और डॉ. गवांडे से इसका सत्यापन करना चाहिए था लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वह जज श्रीराम कुलकर्णी जिन्होंने लोया को अस्पताल में भर्ती किया, साक्ष्य को लेकर उनका एक पत्र भर है और उनसे भी कोई पूछताछ नहीं की गई ।

 इस मौके पर दवे ने कहा, “मैं सुप्रीम कोर्ट के नियम के अधीन आदेश 9 के तहत एक आवेदन देने वाला हूँ जिसमें मैं इन न्यायिक अधिकारियों से पूछताछ करना चाहता हूँ। इस बारे में एक फैसला भी है।”

 वरिष्ठ एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने कहा, “हमें मूल दस्तावेज भी चाहिए। रिकॉर्ड के रूप में जो पेश किया गया है उसे पढ़ा नहीं जा सकता।”

 मेडिट्रिना में लोया को दी गई दवा और बिजली के झटके के बारे में नोट लिखने वाले व्यक्ति की कोई जांच नहीं हुई। करना सिर्फ यह था कि जिसने यह नोट लिखा था उससे यह पूछना था कि क्या यह नोट उन्होंने लिखा है और उसमें जो लिखा है क्या उसकी वे पुष्टि करते हैं। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। मेडिट्रिना में एक प्राथमिक और एक द्वितीयक कंसल्टेंट था। द्वितीयक कंसल्टेंट का बयान क्यों नहीं लिया गया?, गिरी ने पूछा।

गिरी ने कहा, “आकस्मिक मृत्यु की रिपोर्ट सिताबर्दी थाने ने प्रशांत राठी के बयान के आधार पर दर्ज किया। चार न्यायिक अधिकारियों ने यह सूचना क्यों नहीं दी? सिताबर्दी थाने के सब इंस्पेक्टर मुंठे और सिपाही पंकज से कोई पूछताछ नहीं हुई। हमारे पास इस बात के दस्तावेज हैं जो यह बताते हैं कि सीआरपीसी की धारा 174 के अधीन जांच सदर थाने को सौंप दी गई पर इस बात को लेकर भ्रम है कि ऐसा शाम 4 बजे  किया गया या 8 बजे। ”

 इस मोड़ पर वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे और मुकुल रोहतगी ने जवाब दिया, “आकस्मिक मृत्यु की केस डायरी लगभग 4 बजे शाम को सदर को सौंपी गई।”

 साल्वे ने पहले स्पष्ट किया था कि प्रशांत राठी का बयान 8.30 बजे सुबह रिकॉर्ड किया गया और इसे सदर को सौंप दिया गया; इस बारे में दूसरा बयान नहीं था।

 न्यायमूर्ति खानविलकर ने भी महाराष्ट्र सरकार के वरिष्ठ वकीलों से सहमति जताई कि केस डायरी की रिकॉर्डिंग 4 बजे सुबह सदर में हुई और इसकी नकल 8 बजे शाम को की गई। इसके बाद न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे “नक़ल बयान” के 8 बजे के आसपास होने की बात पर ज्यादा जोर न डालें।

गिरी ने आगे कहा, “मुझे इस बात का कोई जवाब नहीं मिल रहा कि 1 दिसंबर 2014 को हुई आकस्मिक मौत की घटना की समरी उक्त तारीख को 4 बजे सुबह बनाने के बाद इस मामले की समरी दुबारा 2016 में क्यों रजिस्टर की गई।”

दवे ने कहा, “यह एक गंभीर विरोधाभास है”।

गिरी ने कहा, “जिन दस्तावेजों पर जांच आधारित है उससे जुड़े किसी भी डॉक्टर, पुलिस अधिकारी या न्यायिक अधिकारी की जांच नहीं की गई। लोया को डॉ. प्रशांत हरकुत के सुझाव पर मेडिट्रिना अस्पताल ले जाया गया पर इस बात की भी जांच नहीं की गई है। यह बात स्पष्ट नहीं है कि लोया को जब मेडिट्रिना अस्पताल लाया गया तो उनकी मौत हो गई थी या फिर इस अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मौत हुई। डॉ. हंसराज बहेटी से रुक्मेश जाखोटिया, फिर इनकी और डॉ. प्रशांत राठी के बीच लोया के छाती में दर्द को लेकर फ़ोन पर हुई बातचीत की जांच नहीं हुई। सरकार ने यह बताने का कष्ट नहीं उठाया है कि प्रशांत राठी घटना के दिन सिताबर्दी थाने और सदर दोनों ही जगह 8.30 बजे सुबह कैसे मौजूद था; और कैसे 1 दिसंबर 2014 को हुए पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में मौत 7 दिसंबर 2014 दर्ज है। डॉ. प्रशांत राठी के किसी भी बयान में चार में से किसी न्यायिक अधिकारी की उपस्थिति का जिक्र नहीं है और न ही किसी न्यायिक अधिकारी ने अपने बयानों में डॉ. राठी का जिक्र किया है। जज बर्डे का बयान बताता है कि दांडे अस्पताल में लोया का ईसीजी कराया गया था पर रिकॉर्ड में ईसीजी रिपोर्ट है ही नहीं। एक परस्पर विरोधी दावा भी किया गया है कि दांडे अस्पताल में ईसीजी की मशीन टूटी हुई थी।”

गिरी ने कहा, “हालांकि, हम किसी का नाम नहीं ले रहे; हो सकता है कि इन विसंगतियों का जवाब हो। इसीलिए इस मामले की एक स्वतंत्र जांच जरूरी है, इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है।”

वरिष्ठ वकील पल्लव सिसोदिया ने इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट्स और कारवाँ मैगज़ीन में छपी रिपोर्ट का तुलनात्मक सारांश प्रस्तुत किया जो कि जज लोया की मौत की परिस्थितियों को लेकर था। इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट के लिए अन्य बातों के अलावा मेडिकल चिकित्सा से संबंधित मुद्दों और पोस्ट मार्टम रिपोर्ट को आधार बनाया है और निष्कर्ष निकला है कि लोया की स्वाभाविक मौत हुई थी। महाराष्ट्र सरकार का भी यही कहना है। पर कारवाँ ने अपनी स्टोरी को बॉम्बे हाई कोर्ट के तत्कालीन सहयोगी के माध्यम से घूस के आरोपों पर बुना है जिसका कोई साक्ष्य नहीं है। किसी को झूठे इल्जाम लगा देने और बच कर निकल जाने की छूट नहीं मिलनी चाहिए और ऐसे व्यक्ति को क्षति पहुंचाने के लिए परिणाम भुगतना चाहिए।

सिसोदिया ने कहा, “जो हो रहा है वह स्वतंत्र जांच जैसा ही है क्योंकि जज महोदय सारा कुछ देख रहे हैं”.

 जयसिंह ने अपने दलील में कहा, “अगर सिसोदिया के मुवक्किल जांच नहीं चाहते तो फिर याचिका दाखिल क्यों की गई है?”

 इस मौके पर वरिष्ठ वकीलों के बीच वाकयुद्ध छिड गया – “याचिका सिर्फ इसलिए दायर की गई ताकि मामले को बॉम्बे हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर कराया जा सके...”, दवे ने कहा।

 सिसोदिया ने इस पर कहा, “आप क्या कहते हैं हमें इसकी परवाह नहीं है।”

 न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों की तस्वीरों की ओर इशारा करते हुए कहा, “ये जो तस्वीरें हमारी ओर हर दिन देखती हैं, कृपया हम इनको

नजरअंदाज न करें,” और उन्होंने आगे कहा, “दवे, जब जज आपसे प्रश्न पूछते हैं तो आपको उनको सुनना पड़ेगा”।

दवे ने गुस्से में कहा, “मैं नहीं सुनूंगा। ये लोग पहले अमित शाह का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और अब ये महाराष्ट्र सरकार की पैरवी कर रहे हैं। यह बात आसानी से पचने लायक नहीं है। ये लोग न्याय में अड़ंगा डाल रहे हैं। बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया सत्य की आवाज उठाने के लिए मुझे नोटिस जारी कर रहा है पर ये लोग तो छूट जाएँगे”।

 न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ के हस्तक्षेप पर सिसोदिया ने बिना शर्त माफी मांग ली।

 अपनी दलील जारी रखते हुए जयसिंह ने कहा, दो तरह के विरोधाभास हैं। गिरी ने जांच रिपोर्ट के अंदर के विरोधाभासों की ओर ध्यान खींचा है। इसके अतिरिक्त कुछ बाह्य विरोधाभास भी हैं जिसके बारे में प्रेस में छपा है। मैं बॉम्बे हाई कोर्ट के दो जजों के बारे में मीडिया में छपी रिपोर्ट के बारे में आपका ध्यान आकृष्ट करूंगी”।

इस बात को दोहराते हुए कि “16 लोगोंके बयान दर्ज नहीं किए गए”, और यह बताते हुए कि क्यों और कब कोई जांच की जानी चाहिए, जयसिंह ने सीआरपीसी की धारा 157 के तहत “संदेह करने के कारण” पर जोर दिया जिसमें जांच की प्रक्रिया का वर्णन है।

जयसिंह ने कहा, “गिरी ने बताया है कि सब कुछ ठीकठाक नहीं है; उन्होंने जिन विरोधाभासों की और ध्यान खींचा है उससे “संदेह करने का पर्याप्त कारण” प्राप्त होता है। शुरू में इसे प्रथम दृष्टया नहीं बनाया जाना चाहिए”।

इसके बाद उन्होंने पीठ का ध्यान तीन साक्ष्यों की ओर खींचा जो महाराष्ट्र सरकार ने उनके सामने नहीं रखे हैं और जो इस मामले की जांच की तत्काल जरूरत बताते हैं – “हमने रवि भवन के रजिस्टर की फोटोकॉपी प्राप्त की है जिसमें जज लोया के नाम का कहीं जिक्र नहीं है। अगर आप एंट्री 47 को देखें, तो आपको पता चलेगा कि प्रकाश आंबेडकर उस गेस्टहाउस में 2017 में रुके थे जबकि रजिस्टर 2014 का है। इस एंट्री के बाद स्थान खाली है और तब श्रीकांत कुलकर्णी और श्रीमती फन्सलकर का नाम आता है जो कि बॉम्बे से आए थे। जज लोया का नाम यहाँ नहीं है”।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, “कुलकर्णी के नाम के नीचे हाई कोर्ट के नागपुर पीठ के प्रोटोकॉल अधिकारी का नाम है और लिखा है कि उन्होंने कमरे का आग्रह किया है”।

“यहाँ तक कि वीवीआइपी लोगों के नाम तक दर्ज हैं, सिर्फ प्रोटोकॉल अधिकारी का ही नहीं। मैं यह कहना चाहती हूँ कि गेस्टहाउस में आने वाले सभी व्यक्तियों का नाम यहाँ पर दर्ज होता है भले ही उसका रैंक कुछ भी क्यों न हो”।

जयसिंह ने कहा, “एक कमरे में ठहरने वाले लोगों की संख्या वाले कॉलम को खाली छोड़ा गया है। कृपया इसे जज मोदक के बयान के साथ पढ़िए कि “हम तीन लोग एक ही कमरे में ठहरे”। यह बहुत ही अजीब बात है कि दो बिस्तरों वाले कमरे में तीन लोग ठहरे जबकि इस बात का कोई संकेत नहीं है कि वहाँ कमरे की कोई कमी थी”।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने यह कहते हुए कि कमरों के बारे में रजिस्टर में अलग से बताया गया है, कहा, “वह एक सूट था, जिसमें दो बिस्तर थे, एक सोफा और एक डेस्क था”।

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