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वयस्क क्या करना चाहती है यह उसकी मर्जी है, हम उसके सुपर अभिभावक की भूमिका में नहीं आ सकते : सुप्रीम कोर्ट [आर्डर पढ़े]

LiveLaw News Network
6 Jan 2018 7:01 AM GMT
वयस्क क्या करना चाहती है यह उसकी मर्जी है, हम उसके सुपर अभिभावक की भूमिका में नहीं आ सकते : सुप्रीम कोर्ट [आर्डर पढ़े]
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सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ एक विशेष अनुमति याचिका को खारिज कर दिया जिसमें एक माँ ने अपनी बेटी और बेटे को कोर्ट में पेश करने का अनुरोध किया था। उसने आरोप लगाया था कि उसकी बेटी और अवयस्क बेटे को उसके पिता ने गैरकानूनी ढंग से कुवैत में नजरबंद कर रखा है। कोर्ट ने कहा कि बेटी 18 साल की हो गई है और उसने इस दलील को मानने से अस्वीकार कर दिया कि बच्चों का बाप इनको गैरकानूनी ढंग से नजरबंद कर रखा है।


मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, डीवाई चंद्रचूड़ और एएम खान्विलकर की पीठ ने कहा, “एक वयस्क क्या करना चाहता है यह उसकी मर्जी है। जब तक उसकी अपनी मर्जी है, कोर्ट उसके सुपर अभिभावक की भूमिका में नहीं आ सकता। उसको माँ की भावुकता और बाप के अहंकार से कोई लेना देना नहीं है।”

अवमानना की एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के 22 सितम्बर 2017 के आदेश के सिलसिले में लड़की खुद कोर्ट में शुक्रवार को मौजूद थी और उसने कहा कि 19 सितम्बर 1998 को उसका जन्म हुआ और इस दृष्टि से वह वयस्क है। उसने कहा कि वह इस समय कुवैत में समाजशास्त्र में स्नातक की पढ़ाई कर रही है और इस समय उसका करियर बहुत ही महत्त्वपूर्ण है और इस वजह से वह इस समय कुवैत में ही रहना चाहती है, भारत नहीं आना चाहती।

उसके बालिग़ होने और कुवैत में ही रहने के बयान के बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की यह दलील मानने से मना कर दिया कि उसकी बेटी वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर नहीं है और उसकी बेटी जो कह रही है उसे वह खुद नहीं समझ रही है बल्कि अपने पिता के इशारे पर ऐसा कह रही है।

पीठ ने उन इमेल्स पर भी कोई ध्यान देने से इनकार कर दिया जो बेटी ने याचिकाकर्ता माँ को लिखा था जिसमें उसने कुवैत में उसको हो रही तकलीफ़ का जिक्र किया था और अपनी माँ के साथ रहने की इच्छा उसने जाहिर की थी। फिर बेटी कॉरेस्पोंडेंस कोर्स में पंजीकृत है और इसलिए उसका कुवैत में रहना जरूरी नहीं है, इसे भी कोर्ट ने रद्द कर दिया।
पीठ ने कहा, “हम सिर्फ यह जानते हैं कि एक वयस्क को अपनी मर्जी से चलने का अधिकार है। यह कहने की जरूरत नहीं है कि जीवन में वयस्क बनने का अपना अलग महत्त्व है। कोर्ट को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि बाप ने बेटी पर अपनी राय थोपी है कि नहीं। हमें इससे भी कोई मतलब नहीं है कि बेटी कुवैत में किस वजह से रहना चाहती है।”

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