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पूर्व CJI के जी बालाकृष्णन के खिलाफ जनहित याचिका पर SC में सुनवाई बंद, NGO ने याचिका वापस ली

LiveLaw News Network
13 Dec 2017 5:11 AM GMT
पूर्व CJI के जी बालाकृष्णन के खिलाफ जनहित याचिका पर SC में सुनवाई बंद, NGO ने याचिका वापस ली
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सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अरूण मिश्रा और जस्टिस एम शांतनागौदर की बेंच ने पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस के जी बालाकृष्णन के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति की जांच वाली याचिका का निस्तारण कर दिया। गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज की इस याचिका को वापस लेने के लिए खारिज किया गया और उचित उपचार के लिए छूट दे दी गई।

इस जनहित याचिका में केंद्र सरकार को तत्कालीन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस के जी बालाकृष्णन के खिलाफ जांच के लिए दिए गए दस मई 2012 के आदेश का पालन करने के निर्देश देने की मांग की गई थी।

ये कहा गया कि इस मामले ने न्यायपालिका की जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाए हैं और कोर्ट को प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट के तहत जस्टिस बालाकृष्णन के खिलाफ सीबीआई को प्रारंभिक जांच के आदेश देने चाहिए।

कोर्ट इस दलील में नहीं जाना चाहता था कि उनके द्वारा बेनामी संपत्ति अर्जित की गई लेकिन कोर्ट ने कहा कि आय के स्त्रोत को लेकर आयकर की अथॉरिटी ने पूरी तरह छानबीन नहीं की और इसे देखा जाना चाहिए।

13 फरवरी 2017 को कोर्ट ने केंद्र सरकार को जस्टिस बालाकृष्णन के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति की जांच वाली याचिका पर जवाब मांगा था। ये निर्देश कॉमन कॉज की 2016 की उस अर्जी पर मांगा गया जिसमें प्रार्थना में संशोधन की मांग की गई क्योंकि पहले याचिका में  जस्टिस के जी बालाकृष्णन को मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से हटाने की मांग की गई थी। वो पहले से ही पदमुक्त हो गए थे और याचिका निष्प्रभावी हो गई थी।

मंगलवार को वकील प्रशांत भूषण ने NGO की ओर से पेश होते हुए इन आरोपों की स्वतंत्र जांच के आदेश देने की मांग की।

बेंच मे कहा कि कोर्ट को ये नहीं पता कि सुप्रीम कोर्ट के जजों की जांच के मामले में उचित प्रक्रिया क्या है। ये प्रक्रिया कोर्ट को बताई जाए। कोर्ट के वर्तमान जज के मामले में ये प्रक्रिया अलग है लेकिन ये याचिका रिटायर्ड जज के खिलाफ है। भूषण ने कहा कि FIR दर्ज करना सही प्रक्रिया है।

लेकिन कोर्ट ने कहा कि चूंकि इस मामले में FIR दर्ज नहीं हुई है इसलिए ये याचिका अभी परिपक्व नहीं है। इसके लिए मांगी गई राहत नही दी जा सकती। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को याचिका वापस लेने और उचित अथॉरिटी से संपर्क करने की छूट दे दी।

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