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न्याय में देरी और लंबित मामलों से निपटने में “बार और बेंच” दोनों को साथ काम करना होगा : न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा

LiveLaw News Network
27 Nov 2017 1:39 PM GMT
न्याय में देरी और लंबित मामलों से निपटने में “बार और बेंच” दोनों को साथ काम करना होगा : न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा
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सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने कहा कि पूरे देश का हाई कोर्ट शनिवार को भी काम कर रहा है ताकि आपराधिक जेल अपीलों की सुनवाई कर उसका निपटारा कर सके। ये ऐसे मामले होते हैं जिनमें अभियुक्त 10 साल से जेलों में पड़े होते हैं।

उन्होंने कहा कि पिछले ढाई महीने में उच्च न्यायालयों ने 1100 आपराधिक मामलों को निपटाया है। यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इतने ही समय में 3200 लंबित मामलों को निपटाया है। मुख्य न्यायाधीश ने आगे कहा कि यह जरूरी है कि एडवोकेट कोर्ट में तैयार होकर आएं और वे न तो मामले के स्थगन की माँग करें और न ही ज्यादा जरूरी और पुराने मामले की कीमत पर हाल में दायर मामले की शीघ्र सुनवाई की मांग करें। उन्होंने कहा, “अदालत में लंबित मामले से निपटने के लिए बार और बेंच दोनों को साथ मिलकर काम करना होगा। हम लंबित मामले को अपने सामने शेर की तरह गरजने नहीं दे सकते।”

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) ने रविवार को 68वां संविधान दिवस समारोह मनाया। यह समारोह सुप्रीम कोर्ट परिसर में आयोजित हुआ।

इस अवसर पर एससीबीए के संयुक्त सचिव राहुल कौशिक ने न्यायिक प्रक्रिया के प्रति बार के समर्पण को दुहराया।

एससीबीए के अध्यक्ष आरएस सूरी ने कहा कि “बार न्याय रूपी पहिए के कॉग हैं”। उन्होंने सभी एडवोकेट का आह्वान किया कि वे “शिक्षार्थी” बने रहें और सीखना जारी रखें। क़ानून जैसे पवित्र पेशे के वाणिज्यीकरण और एडवोकेट के गैर जरूरी मामलों को उठाने और अनावश्यक रूप से मामले को खींचने पर पश्चाताप करते हुए उन्होंने महात्मा गाँधी को उद्धृत किया, “एक वकील का सच्चा काम है अलग हुए पक्षों में मेल कराना”। उन्होंने वरिष्ठ वकीलों से आग्रह किया कि वे सलाहकार की भूमिका को अपनाएं और पांच जूनियर वकीलों को अपने संरक्षण में लें। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश से सुप्रीम कोर्ट परिसर में आधा एकड़ जमीन देने का आग्रह किया ताकि वहाँ एडवोकेट के लिए चैम्बर बनाए जा सकें और मनोरंजन और अकादमिक कार्य की सुविधाएं वहाँ जुटाई जा सके।  उन्होंने कानूनी मंत्री रविशंकर प्रसाद से कहा कि बार एसोसिएशन को जीएसटी से मुक्त किया जाए।

महाधिवक्ता केके वेणुगोपाल ने कहा, “मैं मुख्य न्यायाधीश से पहले ही कह चुका हूँ कि भारत सरकार ट्रिब्यूनल से जुड़े अधिनियम में संशोधन करने जा रही है और इसके तहत जजों को प्रथम दृष्टया वरीयता दी जाएगी। उन्होंने आगे कहा कि वे मामलों के सुनवाई अदालत में आने से लेकर उसके अंतिम फैसले आने में हो रही देरी से चिंतित हैं। उन्होंने अदालत में लंबित मामलों में भारी वृद्धि होने के लिए जजों की भारी कमी को जिम्मेदार ठहराया।  उन्होंने कहा, “इस समय हमारे देश में हर 10 लाख आबादी पर मात्र 18 जज हैं।” अंततः, उन्होंने सुझाव दिया कि एक राष्ट्रीय अपीली अदालत गठित की जाए जिसमें उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम में से प्रत्येक क्षेत्र के लिए 15 जजों की नियुक्ति का प्रावधान होगा जो पांच और तीन जजों की बेंच में काम करेंगे ताकि सुप्रीम कोर्ट को मकान मालिक और किराएदार के बीच विवाद, विवाह संबंधी मामले और जमानत जैसे मुद्दों की सुनवाई से मुक्ति दिलाई जा सके। इससे सुप्रीम कोर्ट के पास सुनवाई के लिए सिर्फ संवैधानिक मामले, क़ानून की व्याख्या और हाई कोर्ट में असहमति से जुड़े मामले ही रह जाएंगे।

क़ानून  मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इस अवसर पर कहा कि वर्ष 2016 में ऊंची अदालतों में 126 जजों की नियुक्ति हुई जो कि 30 सालों में सबसे अधिक है। वर्ष 2017 में अब तक ऊंची अदालतों में 106 नियुक्तियां हुई हैं। प्रसाद ने कहा कि निचले स्तर की न्यायपालिका के लिए 3000 कमरे बनाने के लिए आवश्यक राशि दी गई है। प्रसाद ने कहा कि निचली अदालतों में देश भर में 5000 न्यायिक अधिकारियों की भर्ती होनी है और उन्होंने संबंधित उच्च न्यायालयों से इस बारे में उचित कदम उठाने को कहा।

समारोह में बार में अपने 50 साल पूरी करने वाले एससीबीए के सदस्यों के योगदान को सराहा गया। इनमें शामिल हैं कोका राघव राव, अनूप जॉर्ज चौधरी और शकील अहमद।

कल के इस समारोह में इन लोगों के अलावा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एएम खान्विलकर, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति अशोक भूषण भी मौजूद थे।

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