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दिल्ली सरकार बनाम LG : चिदंबरम ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, LG संविधान का बना रहे हैं मजाक

LiveLaw News Network
10 Nov 2017 4:35 AM GMT
दिल्ली सरकार बनाम LG : चिदंबरम ने सुप्रीम कोर्ट में कहा,  LG संविधान का बना रहे हैं मजाक
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सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ में अधिकारों को लेकर दिल्ली सरकार बनाम उपराज्यराल केस की सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार की ओर से पेश पी चिदंबरम ने कहा कि  LG संविधान और लोकतांत्रिक तरीके चुनी सरकार का  मजाक बना रहे हैं। वो दिल्ली में अंसवैधानिक तरीके से काम कर रहे हैं। कानून के मुताबिक उपराज्यपाल के  पास कोई शक्ति नहीं है। सारे अधिकार या तो मंत्रिमंडल के पास हैं या फिर राष्ट्रपति के पास। अगर किसी से राष्ट्रपति सहमत होते हैं तो ये राष्ट्रपति की राय होगी ना कि उपराज्यपाल की।

चिदंबरम ने कहा कि दूर्भाग्यपूर्ण है कि वो फाइलों को राष्ट्रपति के पास ना भेजकर खुद ही फैसलें ले रहे हैं और वो कहते हैं कि वो ही फैसले लेंगे। किसी भी मुद्दे पर मूल मतभेद हो तो मामले तुरंत राष्ट्रपति के पास भेजा जाना चाहिए। IPS, IAS या डिप्टी सेकेट्री आदि तो केंद्र के अधीन हैं लेकिन दिल्ली सरकार के किस विभाग में वो काम करें, उसमें दिल्ली सरकार की राय मानी जानी चाहिए। यहां तो उपराज्यपाल दिल्ली सरकार के कर्मियों भी नियुक्तियों की फाइल ले लेते हैं। जैसे दिल्ली फायर सर्विस एक्ट 2009 में दिल्ली सरकार ने बनाया लेकिन उपराज्यपाल यहां भी नियुक्तियां अपने पास ले रहे हैं।

इस मामले की अगली सुनवाई 14 नवंबर को जारी रहेगी।

दरअसल बुधवार को दिल्ली सरकार की ओर से पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने बहस शुरू की थी। चिदंबरम ने सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर कहा था कि LG ब्रिटिश राज के वक्त के दिल्ली के वायसराय नहीं हैं जैसा कि हाईकोर्ट के आदेश ने बना दिया है।

उन्होंने कहा कि वो सिर्फ राष्ट्रपति के एजेंट हैं और उनके पास उतने अधिकार नहीं हैं जितने राष्ट्रपति को हासिल हैं। चिदंबरम ने ये भी कहा कि संविधान एक कानूनी-राजनीतिक दस्तावेज है। देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा इसकी व्याख्या करते वक्त जनभावना और लोकतांत्रिक प्रशासन का भी ख्याल रखना चाहिए।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगवाई वाली बेंच के सामने चिदंबरम ने कहा कि 239 AA को GNCT एक्ट के साथ देखा जाना चाहिए। GMCT एक्ट के सेक्शन 44 के तहत उपराज्यपाल मंत्रिमंडल की सिफारिश और सलाह पर ही काम करेंगे।  अगर कोई मतभेद होगा तो उन्हें दिल्ली सरकार से स्पष्टीकरण मांगना होगा। इसके बाद भी वो संतुष्ट नहीं होते हैं तो वो राष्ट्रपति के पास भेजेंगे। उपराज्यपाल ना तो फाइल पर बैठे रह सकते हैं और ना ही  ऑटोमैटिक तरीके से राष्ट्रपति के पास फाइल भेज सकते हैं।

इससे पहले सुनवाई के दौरान CJI  दीपक मिश्रा ने कहा था कि उपराज्यपाल दिल्ली सरकार के रोजाना के कामकाज में बाधा नहीं डाल सकते।   सरकार और उपराज्यपाल के बीच मतभेद पॉलिसी मैटर में ही हो सकते है, मगर ये मतभेद सिर्फ मतभेद के लिए नहीं हो सकते। उपराज्यापाल के पास निहित दखल देने की जिम्मेदारी भी अपने आप में संपूर्ण नहीं है। वो हर फैसले में ना नहीं कर सकते. वो सिर्फ इसे राष्ट्रपति के पास उनकी राय के लिए भेज सकते हैं। उन्होने कहा कि उपराज्यपाल के प्रशासनिक कार्य संविधान के दायरे में होने चाहिए। हालांकि, उन्होंने ये भी कहा कि पॉलिसी मैटर में मंत्रिमंडल की सलाह व सिफारिश उपराज्यपाल के लिए बाध्यकारी नहीं है। नीतिगत फैसले का अधिकार उपराज्यपाल के पास मौजूद हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने ये उस वक्त कहा जब दिल्ली सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा था कि नीतिगत फैसलों में भी मंत्रिमंडल की सलाह व सिफारिश उपराज्यपाल के लिए बाध्य्कारी हैं। हालांकि, इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अन्य राज्यों के लिए ये कहा जा सकता है लेकिन दिल्ली के लिए ऐसा नहीं है।

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