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सुप्रीम कोर्ट ने 2001 से 2005 के बीच तीन यूनिवर्सिटी से दूरस्थ शिक्षा से ली इंजीनियरिंग डिग्री निलंबित की, 2005 के बाद की डिग्री रद्द [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
3 Nov 2017 4:05 PM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने 2001 से 2005 के बीच तीन यूनिवर्सिटी से दूरस्थ शिक्षा से ली इंजीनियरिंग डिग्री निलंबित की, 2005 के बाद की डिग्री रद्द [निर्णय पढ़ें]
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सुप्रीम कोर्ट ने 2001 से 2005 के बीच दूरस्थ शिक्षा यानी पत्राचार के माध्यम से राजस्थान के JRN राजस्थान विद्यापीठ, इंस्टीटयूट ऑफ एडवांस स्टडीज इन एजुकेशन और इलाहाबाद के इलाहाबाद एग्रीकल्चर इंस्टीटयूट से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने वाले छात्रों की डिग्री निलंबित कर दी है।

जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस यू यू ललित की बेंच ने कहा है कि ये डिग्री तब तक निलंबित रहेंगी जब तक छात्र UGC और AICTE की देखरेख में परीक्षा पास नहीं कर लेते। साथ ही डिग्री के आधार पर मिले सभी फायदों को भी तब तक निलंबित कर दिया गया है।

कोर्ट ने ऑल इंडिया काउंसिल ऑफ टेक्नीकल एजुकेशन ( AICTE) को लिखित और प्रैक्टिकल परीक्षा आयोजित करने के निर्देश दिए हैं। इसका पूरा खर्च संबंधित यूनिवर्सिटी से वसूला जाएगा।

कोर्ट ने कहा है कि छात्रों को परीक्षा पास करने के दो मौके मिलेंगे और फेल होने पर उनकी डिग्री रद्द और वापस हो जाएंगी। जो छात्र परीक्षा नहीं देना चाहते उन्हें टयूशन फीस व अन्य के लिए जमा किए गए रुपये वापस करने के आदेश दिए गए हैं।

छात्रों को परीक्षा देने के विकल्प पर 15 जनवरी 2018 तक फैसला लेने को कहा गया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से 2005 के बाद ली गई सभी डिग्री को रद्द कर दिया है।

कोर्ट ने साफ किया है कि इंजीनियरिंग की इस तरीके से डिग्री के सहारे ली गई पदोन्नति या अन्य लाभ को वापस किया जाएगा। हालांकि संबंधित विभागों या नियोक्ता द्वारा दिए गए आर्थिक लाभ को वापस नहीं लिया जाएगा।

कोर्ट ने तीनों यूनिवर्सिटी को छात्रों को 31 मई 2018 तक सारा पैसा वापस करने को कहा है।

ये फैसला उस वक्त आया है जब कोर्ट ने पाया कि तीनों यूनिवर्सिटी ने 2005 से पहले तकनीकी क्षेत्र में दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से कोर्स शुरु किए लेकिन इससे पहले संबंधित अथारिटी से इजाजत नहीं ली। उन्होंने 2005 के बाद इजाजत ली जिसे कोर्ट ने सिद्धांतों में कमी के चलते गैरकानूनी घोषित कर दिया।

कोर्ट ने पाया कि 2001-2005 के बीच दाखिला लेने वाले छात्रों के बारे में 2004 में UGC ने गाइडलाइन के जरिए संबंधित यूनिवर्सिटी को आजादी दी थी कि वो पिछले सत्र के लिए इजाजत के लिए आवेदन ले सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि उन छात्रों के लिए सहानुभूति दिखाई जानी चाहिए जिन्होंने 2001-2005 में दाखिले लिए ताकि उन्हें सरंक्षण दिया जा सके।

लेकिन कोर्ट ने ये सहानुभूति उनके लिए नहीं दिखाई जिन्होंने 2005 के बाद दाखिले लिए। कोर्ट ने कहा कि इस संबंध में वक्त वक्त पर जारी पालिसी बयान और चेतावनी बिल्कुल साफ थी कि इन कोर्स को अनुमति नहीं है।

क्या था मामला

दरअसल सुप्रीम कोर्ट दो मामलों की अपील पर सुनवाई कर रहा था। एक मामला उडीसा हाईकोर्ट के फैसले से निकला जबकि दूसरा पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले से।

ये मामला उस वक्त शुरु हुआ जब उडीसा इरीगेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड ( OLIC) ने नौकरी कर करे एक स्नातक इंजीनियर को पदोन्नति देने से इंकार कर दिया। कोर्ट में कहा गया था कि JRN से दूरस्थ शिक्षा के माध्य से ली गई डिग्री मान्यताप्राप्त नहीं है। इसलिए उसे लाभ देने के लिए स्नातक इंजीनियर नहीं माना जा सकता। लेकिन उडीसा हाईकोर्ट ने OLIC से असहमति जताते हुए ऐसे उम्मीदवारों को सेवारत इंजीनियर के तौर पर विचार करने को कहा।

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के सामने याचिका ये थी कि JRN समेत सभी यूनिवर्सिटी से दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से इंजीनियरिंग की डिग्री को सरकारी नौकरी के लिए अवैध घोषित किया जाए। इस प्रार्थना को कोर्ट ने मान लिया।

दोनों हाईकोर्ट ने विरोधाभासी फैसले दिए इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने दोनों मामलों को एक साथ ले लिया।

क्या डीम्ड यूनिवर्सिटी इस तरह के कोर्स चला सकती हैं ये जानने के लिए कोर्ट ने नोटिफिकेशन, सरकुलर और गाइडलाइन देखे। कोर्ट ने कहा कि डीम्ड यूनिवर्सिटी ने बाद में कोर्स के लिए इजाजत मांगी। किसी भी यूनिवर्सिटी ने UGC, AICTE या डिस्टेंस एजुकेशन काउंसिल ( DEC) से पहले अनुमति नहीं ली।

कोर्ट ने कहा कि जब DEC ने इसकी अनुमति दी वो सही नहीं थी क्योंकि इससे पहले AICTE से सलाह लिए बिना इजाजत नहीं दी जा सकती। DEC को ना तो ये अधिकार था और ना ही उसने कोई निरीक्षण किया। कोर्ट ने कहा कि इसी कारण ये डिग्री अवैध और कानून के विपरीत हैं।

कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को सही मानते हुए उडीसा हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया।

कोर्ट के निर्देश

118 पेज के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा के व्यावसायिकरण पर प्रहार किया है और कहा है कि दूरस्थ शिक्षा की डिग्री खासतौर पर तकनीकी शिक्षा से जुडे मामलों में नियंत्रण  और निगरानी का मैकेनिज्म बनाने की जरूरत बताई है। कोर्ट ने कुछ दिशानिर्देश जारी किए हैं।




  1. 1 1994 AICTE नियम डीम्ड यूनिवर्सिटी पर भी लागू होते हैं और इस मामले में AICTE की इजाजत के बिना तकनीकी शिक्षा के लिए कोई नया कोर्स शुरु नहीं कर सकती।

  2. 2001-2005 के सत्र में दाखिला लेने वाले छात्रों के मामले मे UGC ने बाद में इजाजत दी थी और संबंधित अथॉरिटी को हटा दिया था।

  3. इस दौरान दी गई इंजीनियरिंग की डिग्री निलंबित रहेंगी।

  4. AICTE उनके लिए उचित परीक्षा आयोजित करेगा। ये विकल्प उनके लिए उपलब्ध है जिनकी डिग्री को 15 जनवरी 2018 तक निलंबित किया गया है। छात्रों को परीक्षा पास करने के लिए दो मौके मिलेंगे और जो सफल नहीं होंगे उनकी डिग्री रद्द होगी। परीक्षा का सारा खर्च 31 मार्च 2018 तक संबंधित यूनिवर्सिटी से वसूला जाएगा।

  5. जो छात्र इस विकल्प को अपनाना नहीं चाहते उन्हें टयूशन फीस व अन्य खर्च समेत सारा पैसा एक महीने के भीतर वापस दिया जाएगा। उनकी डिग्री रद्द होगी और सभी लाभ व फायदे वापस होंगे।

  6. अगर छात्र नियत समय में परीक्षा पास करेंगे तो उनकी डिग्री वैध रहेगी और सारे लाभ व फायदे वापस होंगे। आर्थिक लाभ को वापस नहीं लिया जाएगा।

  7. जिन छात्रों ने 2001-2005 सत्र के बाद डीम्ड यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की डिग्री ली, वो वापस और रद्द मानी जाएगी। उन्हें मिले सारे फायदे भी वापस होंगे। संबंधित यूनिवर्सिटी छात्रों को 31 मई 2018 तक जमा किया गया सारा पैसा वापस करेंगी।

  8. 31 मई 2018 तक सारा पैसा वापस करने ते बाद सभी यूनिवर्सिटी एक हफ्ते के भीतर UGC में हलफनामा दाखिल करेंगी।

  9. कोर्ट CBI को निर्देश देता है कि उन संबंधित अफसरों के व्यवहार की जांच करे जो इन मामलों से जुडे थे और पालिसी के खिलाफ अनुमति देते रहे। साथ ही उन संस्थानों की भूमिका की भी जांच हो जिन्होंने गैरकानूनी तरीके से अपने व्यावसायिक हित के लिए अपनी पोजिशन का दुरुपयोग किया। जांच पूरी होने के बाद उचित कदम उठाया जाए।

  10. UGC ये विचार करे कि क्या JRN, AAI, IASE और VMRF से डीम्ड यूनिवर्सिटी के स्टेट्स को वापस लिया जा सकता है और 30 जून 2018 तक ये जांच पूरी करे। अगर छात्रों को पैसा वापस नहीं किया जाए तो इसे भी कार्रवाई में  शामिल किया जाए।

  11. 11 कोर्ट सभी डीम्ड यूनिवर्सिटी को 2018-2019 सत्र से दूरस्थ शिक्षा के जरिए किसी  भी  कोर्स को शुरू करने से रोकता है जब तक इसके लिए संबंधित अथॉरिटी/ नियंत्रित अथॉरिटी से विशिष्ट इजाजत ना हो और जब तक ऑफ कैंपस सेंटर व केंद्रों का  निरीक्षण ना किया जाए। हर कोर्स के लिए अलग इजाजत हो।

  12. UGCको निर्देश दिया जाता है कि सेक्शन 23 को लागू करे और डीम्ड को एक महीने के भीतर यूनिवर्सिटी शब्द का इस्तेमाल करने से रोके।

  13. केंद्र सरकार शिक्षा, जांच, प्रशासन और कानून के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर उच्च पदों के प्रमुख तीन सदस्यों की कमेटी बनाए। ये कमेटी छह महीने में उच्च शिक्षा के लिए निगरानी व नियंत्रण के मैकेनिज्म को मजबूत करने के लिए रोडमैप तैयार करे। कमेटी डीम्ड के नियंत्रण करने के लिए मैकेनिज्म भी सुझा सकती है। केंद्र सरकार रिपोर्ट मिलने के एक महीने के भीतर उचित कदम उठाए और 31 अगस्त 2018 तक इसे लेकर कोर्ट में हलफनामा दाखिल करे। 11-9-2018 को मामले पर आगे विचार के लिए रखा जाए।


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